Sunday, 21 December 2014

जुबां से फिसलती नहीं...

इश्तेहार-ए-इश्क़ जो गिरा दे वो आवाज़ मुझे मुक़र्रर नहीं
मोहब्बत की तासीर से अनजान तुम्हे आँखों की खबर नहीं
तेरी हथेली को पढ़कर मैंने ये बात जान ली मगर
प्यार मुझी से है तुमको ये बात बस मानती नहीं...

कोई तो मकसद होगा तेरे बाली बगल गिराने का
परियां तो बेवजह यूँ असमान से उतरती नहीं
ये अदाएं ना मार डालें मुझकों कुबूलने से पहले
हलक पे बैठी बात है जुबां से फिसलती नहीं...

तेरी मुस्कुराहट में बंधकर बाघी बना फिरता हूँ मैं
झांक दिल को तेरे मेरा नाम अगर दिख जाए कहीं
ले करता हूँ इज़हार आज जहाँ के कोने-कोने में
अपनाया तूने तो जन्नत है ठुकराया जो तो चोट सही...

इश्तेहार-ए-इश्क़ जो गिरा दे वो आवाज़ मुझे मुक़र्रर नहीं
मोहब्बत की तासीर से अनजान तुम्हे आँखों की खबर नहीं...


Saturday, 13 December 2014

बुरखा नहीं डालूंगी मैं...

लड़की (घटना के पास खड़े एक आम आदमी से) :

लफ़्ज़ कहने वाले कह जाते हैं गुज़र जाते हैं कहकर 
लफ़्ज़ सुनने वाली पर जो बीतती  है सुनो 
हैवानियत की मुस्कानें घेरी हैं सुबह से 
डरी सी आँखें क्या ढूँढती हैं सुनो  

आम आदमी (लड़की से) :

रूह जल उठती है आमानवता की सोच से 
मगर साधारण सा इंसान हूँ, क्या करूँ बताओ?
माँ - बहन की काफ़ी हैं बोझ बनने को 
कब सुनूँ तेरी कराहें, ज़रा हमें भी समझाओ 

लड़की (वहाँ खड़े उस आदमी से मदद ना मिलने के बाद एक बुजुर्ग से) :

बेटी सी हूँ आपकी और बहन सी तुम्हारी 
छूकर तन  और नोच आत्मा देखो दरिंदे जा रहे 
कल भी छेड़ा था, कल फिर आएँगे 
मैं डर रही अकेले वो फिर सताएँगे 
रखी बाँधी  थी ना? आवाज़ ओ उठाओ 
आज बाज़ार में छुआ है, कल घर तक आ जाएँगे 

बुजुर्ग (एक हारी हुई नकारात्मक आवाज़ में) :

मिट चुका है देश बेटी पश्चिम के अभिशाप से 
रोज़ की ये बातें हैं अब तो दिन की शुरुआत से 
बात ले मेरी माँ एक बुर्क़ा डाल शरीर पर 
सर झुककर चल ज़रा, हर चोट ले आदाब से 





लड़की (जो भागते हुए अपने घर अपनी माँ के पास जाति है) :

माँ देखो ये खँरोंच इसकी गहराई नहीं नंपती 
मुझे वो दोष देते हैं जिनसे आवाज़ नहीं उठती 
फेर लेते हैं निगाहें फिर तरस को आ जाते हैं 
माँ साथ चलो मेरे मैं चुप बैठ नहीं सकती 

माँ :

बोला था ना निकलो बाहर घर का काम निभाओ 
झुक गया सर गली - गली, शुद्धिकरन कराओ 
किस अभिमान में लोगों से आँख मिलाऊँगा अब?
ढूँढ लिया है तेरा वर, अब दू जे घर को जाओ 

लड़की :

तुम सबकी मानूँ तो हलक को साँस ना पहचाऊँ 
घर से बाहर जाऊँ तो आँख ना उठाऊँ 
ऊपरवला भी हैरान होगा तुम सबकी बातें सुनकर 
जी चाहे क्यूँ ना दुनिया को आग मैं लगाऊँ…

मगर नहीं।
तेज़ाब का अब डर नहीं तुम सबकी बातें सुनकर 
मुझे आग की फ़िकर नहीं इन लफ़्ज़ों में जलकर 
चलूँगी अकेले, लड़ूँगी  अकेले जब तक जिगर में दम  है 
बुर्क़ा नहीं डालूँगी मैं शैतानों से छिपकर 

बुर्क़ा नहीं डालूँगी मैं शैतानों से छिपकर ।

Monday, 1 December 2014

मुद्दे...


इनका यूँ चलते जाना जिद है या मजबूरी?

उठने को सीने में बैठे मुद्दे आँख मींझते
मुझसे इनका रिश्ता अजनबी सा नही
अक्सर मिलते हैं सिराहने ख़्वाबों को खींचते
कोसती नींद को सुनाते हम भी ज्यादा खुश नहीं...
थक गए हैं शायद इल्ज़ामों के संसार से
पेट काटती गरीबी और दुल्हन के व्यापर से
खून बहाते दुश्मन हैं लालच के आभार से
थक गई है लालच भी लड़ते-मरते संसार से...
लगता है ये मुद्दे सारे बदलने की जिद में बैठे हैं

नींद उड़ाते तेरी-मेरी सुलझने के मत से कहते हैं
हम नहीं ये तुम हो जो बैर फैलाते हो
रंग-नाम-शरीर की कीमत तुम लगाते हो
हमने न डाली आँख-ना हाथ जिसके दामन पर
औरत की बोली बाज़ार में तो तुम लगाते हो...

वो कपट नही सीना था तेरा बारूद से पहले जल गया
सीमा पर लाली का रंग तुम चढाते हो
खुदगर्ज़ी नहीं वो तू था जो खुदा से न डर गया
रस्ते पर माँ-बाप को तो तुम ले आते हो...



हम तो जिंदा होते हैं पल-भर में सो जाने को
हमारी नींद उड़ाकर नफरत में तुम मुस्काते हो
ना कोसो हमें अपने पापों पर मोहरे की फ़िराक में
अपनी दुनिया को तमाशा तो तुम बनाते हो...
वक़्त सामने है अब भी आंख खोलने का
कल की दलीलें बिछाकर क्यों सो जाते हो
हम तो जिंदा होते हैं पल-भर में सो जाने को
हमारी नींद उड़ाकर नफरत में तुम मुस्काते हो...


Sunday, 31 August 2014

अगर अँधा होता तो क्या होता?



सोचता हूँ मैं,अगर अँधा होता तो क्या होता?



कोई दीवार ना होती,कहीं दरार ना होती
बेवजह ख़लिश से कहीं टकरार ना होती
कितनी छत है सिर के ऊपर,सच जानकार ये आँख ना रोती
एक रंग की होती शकलें,सूरत शिक़नो की मोहताज़ ना होती...

व्यंग की मुस्कान बस बातों में होती
ग़रीबी की थकान बस किताबों में होती
हरे रंग में मिल जाती है जो खुशबू नज़र वालों को
मेरी शौक़त और शान बस मोहब्बत मे होती...

अगर मैं अँधा होता तो क्या होता?
हर रस्ता मेरा होता,हर मंज़िल मेरी होती
दिन काले होते तो क्या रात का डर ना होता
हर पल मेरे लिए एक नया सवेरा होता...

अगर मैं अँधा होता तो  क्या होता?

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Friday, 15 August 2014

असल आज़ादी...

 This is an attempt to express the feelings of mother India when there were celebrations going on 67 years before.



मेरे टुकड़ों को जाने कब मेरे टुकड़े करना आ गया
जिसकी कोख में जिए जनम उसकी जान से खेलना आ गया
कल तक जिस माँ को आवाज़ दिए थकते नही थे बच्चे
आज उन्हें ना जाने कैसे उसका खून बहाना आ गया...

चीर मुझे टुकड़ों में दुश्मनी की साँसें जीते हो
रिश्ते तोड़े जिस दिन उसे आज़ादी का नाम देते हो
क्या पाया तुमने अपने अपनों को बैरी बनाकर?
क्यूँ मेरे बच्चों ये झूठी आज़ादी सहते हो?

मैं चीख रही थी आहों में,कोई सुनने नही आया
चीर दिया मुझे टुकड़ों मे कोई मरहम नहीं आया
क्यूँ इतने ख़ुदग़र्ज़ हो गये तुम की ये भी एहसास ना रहा
मैं रोती रही दिनों-रात कोई आँसू पोछ्ने ना आया...

छूटी खुशी को फिर अपना लो,वक़्त अभी बाकी है
नफ़रत की राख से इश्क़ सज़ा लो मोहब्बत बहुत बाकी है
कब तक यूँ मेरे तन को लकीरों से सजाते रहोगे
हाथ बढ़ाने भर की है देरी,असल आज़ादी अभी बाकी है...

मेरे कलेजो को जाने कब मौत का दामन भा गया
काली खिलने को बेताब थी जो उसे काँटों में घुलना आ गया
एकबार तो कोई बेटा मेरे तन को सहला जाता
जिनके सर पर फेरे थे हाथ मैने,उन्हे मेरा सर काटना आ गया...

मेरे टुकड़ों को जाने कब मेरे टुकड़े करना आ गया
जिसकी कोख में जिए जनम उसकी जान से खेलना आ गया...

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Thursday, 31 July 2014

कोई मुस्कुरा देता है तो...

कोई मुस्कुरा देता है तो मैं हाथ बढ़ा देता हूँ
कोई हाथ बढ़ा देता है तो सीने से लगा लेता हूँ
कुसूर बस इतना है मेरे पागल दिल का
कोई धड़कन मिल जाती है तो सीने से लगा लेता हूँ...

हर चेहरे को देखकर अपने दिल को कुछ समझाता हूँ
उड़ती ज़ुल्फ़ो के पीछे आहों-आहों में रह जाता हूँ
एक इशारा-भर मिल जाए तो क्या बात है
सुध-बुध सारी गँवाकर ख्वाबों-ख्वाबों मे रह जाता हूँ...


हम तो दुनिया की खूबसूरती के कायल हैं
खुदा की बनाई सूरतों की अदायगी के घायल हैं
हम तो बस अपना दिल खोलकर रख देते हैं
दुनिया समझा करती है हम नये दौर के शायर हैं...

कोई नज़र मिला लेता है तो निगाहों में बसा लेता हूँ
कोई ख्वाब सजा देता है ज़िंदगी बना लेता हूँ
कुछ ऐसे ही चल रहा ज़िंदगी का सफ़र
राह मे कोई दिख जाए तो साथ बिठा लेता हूँ...

कोई मुस्कुरा देता है तो मैं हाथ बढ़ा देता हूँ
कोई हाथ बढ़ा देता है तो सीने से लगा लेता हूँ...
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Monday, 14 July 2014

पहले प्यार का पहला आंसू...

पहली बारिश का पहला आँसू पहले-पहले प्यार का
गिर जाने दो आज, कोई मुझे रोको मत
एक ख्वाइश थी जी भर रो लेने की
पूरा होने से इसे टोको मत...



यूँही ये बारिश धरती पर बेमौसम उतरी न होती
पहुची होगी बादल तक आह वरना बूँदें रोयी न होती
घुल जाने दो सारी कराहें, यूँ जीने से फिर रोको मत
फिर सूख जाएँगे बारिश के साथ, गिरने से आंसू रोको मत...
पहले प्यार का पहला दर्द है,जश्न से कोई रोको मत
बहुत दर्द है बहाने को अभी,लिखने से मुझे कोई रोको मत...

मशहूर हुए कुछ ऐसे अपनी चाहत के काबिल न रहे
डूबे यूँ तेरी चाहत मेंसाहिल के काबिल ना  रहे
किसी से क्या करें शिकायत अपनी बर्बादी की?
किसी से क्या करें हम शिकायत अपनी बर्बादी की
यूँ मशगूल हुए हम तुझमे साँसों के काबिल न रहे...

भीगकर बैठी नमी फिर तैरने को उठ आई है
खुरेद लेने दो ज़ख्मों को, इन्हें मनमानी से रोको मत
उतर रहीं लकीरें भी हाथों से , बह जाने से इन्हें टोको मत...

पहले प्यार का पहला आंसू है...रो लेने से मुझे रोको मत
                                        पहले दर्द की पहली बारिश...भीग जाने से मुझे टोको मत

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Wednesday, 9 July 2014

याद है...



रेत पर नंगे पैर चलते हाथों का छू जाना याद है
चाय की चुस्की लेते वक़्त नज़रों का मिल जाना याद है
याद है वो भीड़ में छिपकर एक-दूसरे को देखना
जानकार वो अनजाने में अपना करीब आना याद है...

दबे-दबे होठों पर तब कुछ लफ्ज़ हुआ करते थे
सोयी हुई नींदों में कुछ ख्वाब जगा करते थे
क्या दौर था वो जब आँखें बोला करती थीं
हम भी मुस्कुराकर दिल का हाल बयां करते थे...

वो तेरा तीखा काजल आँखों के कोनों में सजना याद है
तेरी पसंद का वो कंगन कलाई में घुमाना याद है
वो लटें तेरी जो रह-रहकर तुझे छेड़ा करती थीं
और उन्हें संवारते वक़्त वो तेरा इतराना याद है...



उफान पर थी धडकनें,करवटों की मनमानी थी
सिराहने सोये थे गम सभी,सिलवटों की शैतानी थी
कितने ही ख्वाब पल-पल बेचैन किया करते थे
प्यार की सीढ़ी चढ़ते वक़्त वो साँसें भी तूफानी थीं...

तेरा उड़ता दुपट्टा थामकर वो तुझे लौटना याद है
भीगी जुल्फें लहराकर वो तेरा शर्माना याद है
याद है वो चौराहा जहाँ इज़हार तुझसे किया था
और इशारों में तेरा वो हामी भरना याद है...

                                               रेत पर नंगे पैर चलते हाथों का छू जाना याद है...
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Friday, 4 July 2014

मुझसे बेहतर ही होगा...


  मैने तुम्हे चुना और तुमने किसी और को,जायज़ है वो...मुझसे बेहतर ही होगा...





बदल दिया खुद को तेरे खातिर
जिसकी चाहत तुझे भायी 
मुझसे बेहतर ही होगा
हम आईने से नफ़रत करते हैं
जो तुम्हे झुमका पहनाए 
मुझसे बेहतर ही होगा
गिरे आँसू मेरी आँखों से ये बात कुछ और है
जो तुझे पल-पल हंसाए 
मुझसे बेहतर ही होगा
मर भी गये तो क्या गम किसे?
मर भी गये तो क्या गम किसे
जो तेरी ज़िंदगी बन जाए
मुझसे बेहतर ही होगा...

बर्बादी का मंज़र चुना है मैने
जिसे तूने चुना
मुझसे बेहतर ही होगा
मैने तो खंजर पाया है
जो तेरा गजरा बने
मुझसे बेहतर ही होगा
हमें इशारों का रहा उम्रभर इंतेज़ार
जो तेरी आँखें चूम ले
मुझसे बेहतर ही होगा
मेरी फ़िक्र की बात छोड़ो जिसका रखे तू ख़याल
खुदा का वो दुलारा
मुझसे बेहतर ही होगा...
मुझसे बेहतर ही होगा...

Monday, 30 June 2014

मैं आवाज़ कैसे भरूँगा ?




नाम से पहले धर्म-जात
                                                                एक थाली है कैसा पाप ?
कुरीतियाँ हैं अंतर्मन में
परंपराओं का करते जाप
सरहद पर मुजरिम है क्या ?
क्यों दिल से पहले सोने पर नाप ?
जो दान पता था भीख थी वो
निज-चेतना को कैसा श्राप ?

अंधी नगरी मे सच का प्रकाश कैसे भरूँगा ?
घर-गलियारों मे विरोधी हुंकार कैसे भरूँगा ?
मैं आवाज़ कैसे भरूँगा ?

ये छोटी जात कौन है ?
वो दुश्मन देश कौन है ?
बेटी जन्मी तो क्या बदला ?
क्यूँ वंश सारा मौन है ?
लिबास से छल की रीति क्यूँ ?
सब दौलत के मुरीद क्यूँ ?
कोई सो गया है भूखे पेट
पत्थर पर दूध-धारा की रीति क्यूँ ?

विनाश की गर्त मे विचारों का उद्धार कैसे करूँगा ?
भ्रमित मनों , बेसहारों का उपचार कैसे करूँगा ? 
मैं आवाज़ कैसे भरूँगा ?
मैं  आवाज़ कैसे भरूँगा ?
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Tuesday, 24 June 2014

इंतेज़ार क्यूँ नही करती...


"इंतेज़ार वो घड़ी है जिसमे काँटे नहीं..."

मुझको हो उसका जैसे वो मेरा इंतेज़ार क्यूँ नही करती
उसको देखने को मरता हूँ,ऐतबार क्यूँ नही करती
खुदा से मिला तो पूछूँगा ऐसी तक़दीर मुझे क्यूँ दी
मुझे उससे मोहब्बत हो गयी वो मुझसे प्यार क्यूँ नही करती...

इतना मरे उनके खातिर की जीना भी भूल गये
इतने बहे आँसू की मुस्कुराना भूल गये
बड़ा नाज़ था अपनी चाहत पर आँखों मे सपने बैठे थे
यूँ टूटा हर एक ख़्वाब नींद मे जाना भूल गये...



काश वो दो पल मुझको अपना प्यार उधर दे सकती
सूखी मेरी रूह दो दो पल सुकून उधर दे सकती
तड़प-तड़प कर जीता रहा उसी के इंतेज़ार मे
काश वो मुझे अपने गमों का हार दे सकती...

मुझमें है इतनी चाहत,खुद को हैरान क्यूँ नही करती
हर सवाल से वाकिफ़ हो मेरे जवाब दो-चार क्यूँ नही करती
बाहों को खोले कब्र की गोद मे आ बैठा हूँ
तुझे देखने को बेताब हूँ कफ़न मोहताज क्यूँ नही करती...

मेरा इंतेज़ार क्यूँ नही करती...

Thursday, 19 June 2014

बारिश क्या हुई आज...



आज हुई है बारिश,वैसी ही जैसे तब हुआ करती थी...




बारिश क्या हुई आज वो सावन में भीगना याद आ गया
गलियों से तेरी रह-रहकर मेरा वो गुज़रना याद आ गया
भीगी तेरी ज़ुल्फो पर जब अपनी उंगलियाँ फिराया करता था
उन दिनों वो तेरा हाथ थामे तन्हा चलना याद आ गया...

दीवारों पर लिखा करते थे साथ में अपना नाम
शाम की ठंड में तेरे हाथ की चाय पीना याद आ गया
वो तेरा मज़े लेते हुए चाय मे नमक डाल देना
और मेरा खुशी-खुशी वो जाम पीना याद आ गया...

कभी सोचा कहाँ था ज़िंदगी ये भी दिन दिखलाएगी
खुशियों पर नज़र लगाकर तुझको दूर कहीं ले जाएगी
देखते हुए जो सूरत मुझे घंटों कम पड़ जाते थे
उसकी एक झलक को आज ख्वाबों में भी तरसाएगी...

वो सुबहें जब तुझे देखने को झट से उठ जाया करते थे
तुम भी मुस्कुरकर मेरा प्यार बढ़ाया करते थे
तेरे खत पढ़ते हुए फिर ये एहसास हुआ मुझको
खुद से भी ज़्यादा तुम मुझसे प्यार किया करते थे...

भीग जो आईं पलकें मेरी तेरा दुपट्टा याद आ गया
हँसाने को फिर मुझको तेरा चेहरे बनाना याद आ गया
जब ज़िंदगी तेरे नाम थी मेरे नाम थी तेरी साँसें
तेरे खातिर मेरा जीना,मेरे नाम पे तेरा गुज़रना याद आ गया...

बारिश क्या हुई आज वो सावन में भीगना याद आ गया...
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Monday, 16 June 2014

इंसान ने खुदा को हरा दिया...



आज के दौर मे हम सभी को एक काम बहुत अच्छे से आता है...वो है "कोसना".
ऊपर वाले से लेकर वक़्त, नसीब और फिलहाल हर कोई गर्मी और बिजली को कोस रहा है...
जिस तरह से हम जीते आ रहे हैं, वो दिन भी दूर नही जब दिन का निकला सूरज रात मे डूबेगा नही...
कैसा होगा वो दौर,एक नज़र दीजिएगा...


खबर आई थी दूर  कहीं , ज़िंदा है कोई जान कहीं
सर पर था सूरज अब भी , रात मे तितली निकल पड़ी
सूखी नसें भिगोने को दुआ उसने अता की 
अरसे की चाहत अपनी पाने को वो मचल पड़ी .

थककर रास्ते मे दो पल पैरों को ज़मीन पर लाया
उगल रही थी आग ज़मीन फिर उसने पर फैलाया
ठहरना चाहा जहाँ भी उसने,पर जलने को आए
हार रही थी हिम्मत वो ढूँढे छाव नही वो पाए .

उबल रही थी हवाएँ भी,सांसो ने फिर हरा दिया
आँसू भी मुनसिफ़ ना थे,झोंको ने पर भी जला दिया
चलता रहा इंसान मगर यूँही अपनी राहों पर
जिसे देख ना पाया वो,उस मौत ने खुदा को डरा दिया .

ना बची अब उसकी धरती,इंसान ने खुदा को हरा दिया...इंसान ने खुदा को हरा दिया .


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Friday, 13 June 2014

बस ज़रा सा वक़्त है...

कहते हैं कुछ लोगों को भुलाना उतना ही
 मुश्किल होता है जितना उन्हे याद करना...


तुझको भूल जाने मे अब बस ज़रा सा वक़्त है
सांसो से टूट जाने मे अब बस ज़रा सा वक़्त है
तू कहा करती थी अक्सर तुझे बारिश मे आग भाती
 है
मुझे रोते-रोते जल जाने मे अब बस ज़रा सा वक़्त है...

सौ बार टूटकर ये दिल हर बार जुड़ जाया करता है
एक और दफे टूट जाने मे इसे अब बस ज़रा सा वक़्त है
किस मिट्टी की थी उम्मीदें मरकर अब तक जीते आई
आख़िरी दफे मर जाने मे इन्हे अब बस ज़रा सा वक़्त है...

जल उठेगा ये बदन अब तेरा पीछा ना करेंगे
बुझ जाएँगी ये आँखे भी,छिप्कर देखा ना करेंगे
कदम-कदम पर मुड़ने की अपनी आदत बदल लेना
राख बनने जा रहा, तेरा इंतेज़ार ना किया करेंगे...

बड़ी देर मे मिली मंज़िल,उम्रभर राहों मे ही रह गये
कश्ती को सागर मे घुल जाने मे अब बस ज़रा सा वक़्त है
दूर रहने का तुझको मैं वादा निभाने जा रहा
पूरा करने मे ये कहानी मुझको अब बस ज़रा सा वक़्त है...

तुझको भूल जाने मे अब बस ज़रा सा वक़्त है
सांसो से टूट जाने मे अब बस ज़रा सा वक़्त है

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Wednesday, 11 June 2014

आवाज़ नही मिलती...

Sep. 26, 2011. My first poem ever.



अपने साए से चौक जातें हैं,उनके साए की तस्वीर भी नही मिलती
रातभर गूंजते हैं सन्नाटे,मेरे नाम को कभी उनकी आवाज़ नही मिलती...



शायद कभी चाहा होगा उन्होने भी हमे,अब तो कभी नज़रें भी नही मिलती
सूख जाती हैं भीगी आँखें एक झलक को,आँखो को दो पल उनकी सूरत नही मिलती...

दिल की गहराई मे कहीं दफ़नाना भी चाहें अगर,उनकी याद ना आए ऐसी गहराइयाँ नही मिलती
उनकी तस्वीर से ही काट लेते ज़िंदगी अपनी,लेकिन मुकम्मल एक तस्वीर भी नही मिलती...

अरसा गुज़र जाता है ज़ुबान से होठों तक आने मे,काग़ज़ पर उतार दे ये एहसास ऐसी स्याही नही मिलती
दर्द का आलम ऐसा है की यही समझ लीजिए की दिल की चोटों को अब हमसे आह भी नही मिलती...

वो पहले थे जिन्होने दी थी दिल पर मेरे दस्तक, अब तो किवाड़ पर गिरी - पड़ी कोई आहट भी नही मिलती
आँखो के झरने को रोकना भी चाहें अगर, इस दरिया का रुख़ मोड़ सके जो ऐसी कोई तरकीब नही मिलती...

रातभर गूंजते हैं सन्नाटे,मेरे नाम को उनकी आवाज़ नही मिलती...
मेरे नाम को उनकी आवाज़ नही मिलती...
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www.apourvpandey.blogspotcom

Here I am :)

Hey friends..

I have absolutely no idea how a blog works. I am actually very skeptical about it. But I want a separate platform for my writings and an online platform seems better than carrying diary too each and every place. I know I'm going to write bad, immature and hard to read poems. I know that because I have absolutely no knowledge about the intricacies involved in writing a poetry; I just write and try to rhyme. But I'm hopeful that someday, I will come back to this post and my early poetries only to find better I have become. And for that, all you readers matter to me most. Try to read my entries, suggest everything you can, roast whatever the way you like and whatever happens, be good to yourself.

A message to my future-self: Don't delete the poetries that cringe you. It's okay you were that bad someday. Have them and be proud of yourself.

Apourv. June 11, 2014.