Saturday, 16 January 2021

आसमान

 

मैं उस दोपहर देर तक आसमान को तकता रहा।
साल की कुछ गिनी चुनी वो शामों में ढलती दोपहरें, जो बिना आंखों और गर्दन को चुनौती दिए एक झलक में ही अलसाय से सूरज और बेपरवाह से चांद का दीदार करा देती हैं, मुझे बेहद पसंद है। मैं ऐसी ऊंघ मारती शामों से थोड़ी हवाऐ उधार मांगकर अपनी जेब में रख लेता हूं। बादलों से सने आसमान में चांद को बार - बार खो देने और फिर से उसे ढूंढने में जेब से थोड़ी थोड़ी हवाऐं खर्च होती जाती हैं और मेरा मन हलका कर वापस हवा बन जाती हैं। 

ऐसी ही शामों के आसमान और बादलों को देखकर वो सारे भ्रम मिट जाते हैं जो बीती रात मोबाइल पर किसी चित्रकार की बेहद वास्तविक सी दिखने वाली पेंटिंग से बने थे।

जब तक मैं वापस अपनी जेबों को भरता हूं, मैं गौर करता हूं कि नीले बादलों और मेरे बीच एक काला आसमान बनने लगा है, वहीं पास की ईंट की भट्टी से निकलते बादलों से। पूरे आसमान की चादर पर यह एक छोटा सा धब्बा मेरी शाम को खलने लग जाता है। इससे पहले कि मेरा पूरा आसमान काला हो जाए, मैं अपनी सारी जेबों, जूतों में हवा भर लेता हूं और उन काले बादलों से ऊपर उड़ जाता हूं। मेरी शाम फिर से वही अलसायी - सी, अधजगी - सी बन जाती है और मैं फिर से अपने चांद को उसके मुरीद की तरह आंखें बंद कर तांकने लग जाता हूं।

मगर यह क्या... आंखें खुलने पर वो काला धब्बा... नहीं! वही धब्बा नहीं, नया धब्बा, उससे भी विशाल, उससे भी गहरा काला मेरे और आसमान की चादर के बीच आकर टहलने लगता है। शायद महीनों से मोटर गाड़ियों से निकला होगा... मैं भी ऐसी ही एक मोटर गाड़ी चलाता हूं।

इससे पहले की यह धब्बा भी आंखों में खटकने लगे मैं सारी जेबों में हवा भरता हूं और उस धब्बे से भी ऊपर पहुंच जाता हूं। मगर मैं कितना भी हवाओं को भर लूं और कितना ही ऊंचा उड़ जाऊं, मेरे और मेरे आसमान के बीच में एक धब्बा हमेशा बना रहता है और मैं... मैं एक नादान बच्चे जैसा अंधेरा होने तक उसी में उलझा रहता हूं। मेरी नासमझी को समझ आते आते शाम जा चुकी होती है और पूरा आसमान काला हो चुका होता है। 

- अपूर्व