Wednesday, 10 August 2016

शिखर


तू शून्य से निहित नहीं, प्रवाह से विलुप्त नही
जो जला भीतर ही है, जल का तू इक्छुक नही
जीत से तू खुश नहीं, तू हारता मनुष्य नही
दीप तू तिमिर नही, तू सांझ का है नभ नही...
कठोर है आसान है विजय की तू पहचान है
जो बोझ काँधे चल रहा हृदय के तेरी जान है
शिखर है तू उफ़ान है, तू शांत है तूफ़ान है
आसमाँ पर है खड़ा तू शक्ति की पहचान है...
तू शूल है त्रिशूल है उसूल है प्रहार है
कायरों की बस्ती में तू शेर की दहाड़ है...
तू थम नही तू रुक नही तू आँधियों को भेद दे
तू जीत ले धरा को तू बेड़ियों को चीर दे
निरर्थ नही ये क्षण तेरा जा इसको तू संवार दे
है शिखर पर तू बसा हर साँस से प्रमाण दे...
है शिखर पर तू बसा हर साँस से प्रमाण दे...
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जो कायर हैं कायरता से उनके बैठे मतभेद हैं
तू शूरवीर: कोख से घाट प्रतिदिन ही कुरुक्षेत्र है
रण में रथ तेरा अब ना कोई चक्रधर रोक सके
ना बाण किसी भी अर्जुन की तेरे कवच को भेद सके
अग्नि की चीख़ उठेगी जब तू राग सति का गाएगा
होलिका की गोदी में नन्हा प्रह्लाद मुस्काएगा
ये रण है जिसमें साँस-साँस में 
जहाँ हर तेरी बात-बात में
हर ऊँगली की आँखें ताके
नाम-नाम में ज़ात-ज़ात में
कर फ़क्र तू अपनी माटी पर बन बीज बंजर उजाड़ दे
है शिखर पर तू बसा हर साँस से प्रमाण दे
है शिखर पर तू बसा हर साँस से प्रमाण दे ।