कभी चलो अकेले गलियों में
तो तुमको भी पता चले
हवा बही किधर ऐ बेख़बर
कुछ तुमको भी ख़बर पड़े
तू बना क्या है किस मिट्टी का
आँखों में तरस है या है प्यास
तनहा ही हँसता ख़ुद में ही रोता
पूछे ख़ुद से ही कि क्या है बात
ज़मीं के कोने बंद कमरों में
दो दिन जी लो तो पता चले
जो लिखा-पढ़ा जो कहा-सुना
जो देखा दिखा जो सालों बुना
कहाँ गया वो ख़्वाब तुम्हारा
ढूँढे बहुत ना पता चले...
कभी चलो अकेले गलियों में
तो तुमको भी पता चले
हवा बही किधर ऐ बेख़बर
कुछ तुमको भी ख़बर पड़े...
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वो कल की लगती है बातें जब साथ सभी के बैठे थे
जब घर से बड़े-छोटे और मेरे दोस्त सभी ये कहते थे
तू रुक मत तेरी फ़ितरत में रफ़्तार को हमने भाँपा है
लकीरों में ना सिमट तू तेरी तक़दीर को हमने नापा है
उठ भविष्य का हाथ थामकर ला रख दे तू आज में
वक़्त का तू मोहताज़ कहाँ सारा वक़्त है तेरे सामने
सारा वक़्त है तेरे सामने...
कभी बिताओ ज़रा सा वक़्त धुएँ में
तो तुमको भी पता चले
रफ़्तार तुम्हारी क्या है असली
क्या है औक़ात पता चले...
कभी चलो अकेले गलियों में
तो तुमको भी पता चले
हवा बही किधर ऐ बेख़बर
कुछ तुमको भी ख़बर पड़े...
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