Friday, 19 April 2019

बच्चे


नीम की वो सूखी शाख से होते हैं
लाखों हैं बच्चे जो फुटपाथ पर सोते हैं।
अब भागते नही वो लंबी गाड़ियों के पीछे
चारों पहर रोटी की ताक में रहते हैं।
फरिश्तों को भी एहसास है इस कहर का
वो खुदगर्ज़ इमारतों की बाँह में सोते हैं।
लाखों हैं बच्चे जो फुटपाथ पर सोते हैं।

बड़ी ही एहतियात से पसरते हैं वो जमीन पर
तन जिनके चादर के मोहताज़ ना होते हैं।
बारिशों में लोग भीगते हैं अमन से
और सड़कों पर बच्चे बेहिसाब सोते हैं।
अक्सर आती हैं ख़बरें दरवाज़ों के नीचे से
सक्रीन पर चमक कर या कानों के पीछे से 
कि कौन मरा और कौन बिका 
था नाम क्या है कौन सागा
वो क्या सपने देखता था
वो क्यूँ चूड़ियाँ बेचता था 
कौन सा सिगनल उसका था 
वो कौन उमर का बच्चा था
की क्या कहते थे लोग उसे
कहाँ रखा गया था क़ैद उसे
मुआजफ़ज़ा क्या सरकार का है
कितना मुम्बई कितना बंगाल का है 
कितना मुम्बई कितना बंगाल का है ...
माँ-बाप सभी के हमारे जितने कामयाब ना होते हैं
लाखों हैं बच्चे जो फुटपाथ पर सोते हैं।
अब भागते नही वो लंबी गाड़ियों के पीछे
चारों पहर रोटी की ताक में रहते हैं।
लाखों हैं बच्चे जो फुटपाथ पर सोते हैं।
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Saturday, 6 April 2019

समझदार

सुबह की लेट करती क्लासों में, वो कैंटीन वाले मज़ाक़ों में
Hostel के रूखे-सूखे नाश्तों में और शाम के बताशों में
जब कहना नहीं होता था कि कब और कहाँ मिलना है
बस चाय के बाद पूछते थे की आज बोलो कहाँ चलना है
Boys hostel वाली हरकतों में और girls hostel वाली गलियों में
First year की सिधायी से final year की गालियों में
कुछ इतना हुआ मशगूल कि भूल गया
भूल गया कि अभी बड़ा होना बाकी है, समझदार होना बाकी है

तब कुछ professor लोग ही जल्लाद थे लेकिन हम आज़ाद थे
हक़ीक़त में भी साथ थे सपनों में भी पास थे
रह-रहकर notes मगने की लड़ाईयों में
Senior-junior और girlfriend-boyfriend की कहानियों में
जब उनसे गिरे थे जिन्हें वो सारी कहानियाँ बता दीं
जो बचपन से रोकी थीं वो सारी ख़ामियाँ जाता दीं
जी-भर जिया वो दिन महज़ इतना भूल गया
भूल गया कि अभी बड़ा होना बाकी है, समझदार होना बाकी है

छोटे से उन कमरों दर्जनों बैठ जाते थे
और उसी वक़्त को कोस साथ में झल्लाते थे
कि देखो, देखो क्या हो गयी है ज़िंदगी
पटरी पर दौड़ने वाली ये उतर कब गयी ज़िंदगी
और बेपरवाही में घूँट बढ़ाकर फिर हँस देते थे तब 
जब मिलकर सब कह देते थे अमाँ भाड़ में जाए ज़िंदगी
बड़े कमरों और ऊँची छतों का ख़्वाब बहुत देखा मगर भूल गया
भूल गया कि अभी बड़ा होना बाकी है, समझदार होना बाकी है


इन रिश्तों की कड़ी मानों जैसे मोम से गढ़ी हो
मोम, जो इस समय की धूप में पिघल रही है धीरे-धीरे
मोम, जो दिख रही है अब संभालना नहीं चाहती
जिसे आदत लग गयी है रोशनी की ऐसी की अंधेरों में दम घुटता है
जिसे ठहाकों की आदत लग गयी ऐसी की अकेले में हर पल चुभता है
लाख पिघालीं मोम रोज़ की दिवालियों में बस इतना भूल गया
भूल गया अभी सारी मोम गलना बाकी है, हर कड़ी पिघलना बाकी है
कि अभी बड़ा होना बाकी है, समझदार होना बाकी है
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