Friday, 27 November 2020

तेरा नाम


सफ़र में मिला अनजान मैं उससे बात करूँ तो क्या
ज़ुबान आवाज़ उठाती है तो तेरा नाम आता है

वो भोला वो बेचारा सुनाया काम के क़िस्से
जो मेरा काम वो पूछा तो तेरा ज़िक्र आता है

मुझसे कहा कि ज्ञानी है हाथों की लकीरों का
मैं लकीरें पढ़ाता हूँ तो तेरा नाम आता है

हसीन पहचान है मेरी जो मुझको याद करते हैं 
मेरी हर याद में सबकी तेरा ही ज़िक्र आता है

ज़ुबान आवाज़ उठाती है तो तेरा नाम आता है

शिकायतें ख़ूब है मेरी वो तेरा पता माँगती हैं
जब-जब प्यार आता है तो तेरा नाम आता है

 मन्नतें हज़ार मैं माँगू अपनी ख़ुशगवारी की
दुआओं में हाथ उठता है तो तेरा ज़िक्र आता है

मिलकर ढूँढें बहाना जो तुम को पास फिर ले आए
मैं एक भी साँस भी भर लूँ तो तेरा नाम आता है

मोहलत दो ज़रा ख़ुद को कि शायद लौट आना हो
 बहस उम्मीद की जब हो तो तेरा ज़िक्र आता है 
ज़ुबान आवाज़ उठाती है तो तेरा नाम आता है

वो राही दाद देता है मेरी ख़ुशनसीबी का
नसीब का दाद जो मैं दूँ तो तेरा नाम आता है

 नफ़ा-नुक़सान की बातें करम-तक़दीर की बातें
खुदा हिसाब करता है तो तेरा ज़िक्र आता है

ज़ुबान आवाज़ उठाती है तो तेरा नाम आता है
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Sunday, 11 October 2020

इतवार


इतवार कहीं छलक गया
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हफ़्तों में संजोया था
घण्टों में पिरोया था
फ़र्शें चमकायीं, धूल उड़ायीं
कैलेंडर को दीप-बत्ती दिखलायी
बिस्तर टटोला चादर सँवारे
परदों से ढाँके सारे उजाले
शनिवार नहाया पान लगाया
मदिरा संग जलपान सजाया
मिनट भर बीड़ी क्या सुलगायी
जाम मेरा भड़क गया
इतवार कहीं छलक गया
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मुर्दों ने बोला यहाँ चैन नहीं है
नर्क नहीं कोई स्वर्ग नहीं है
जितनी कहानियाँ उतने सार
हर सवाल का हल इतवार
मैंने ताने मूँछ चढ़ा तेवर 
कि क्या रखा बाक़ी दिन में ?
झक मारें सब नाकारे सब
क्या क़ीमत इनकी महफ़िल में
ये बात सुनी तो सच मानो
मंगल मेरा भड़क गया
ना शुक्र दो पल बैठा शान्त
गुरु भी झट से तमक गया
इतवार कहीं छलक गया
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घनघोर प्रकोप: मंगल me  दोष
शनि प्रसन्न, सोम में रोष
टीके, मंतर, पत्थर, पताके
घर आँगन छाती से चिपकाए
बदले नाम बदले मन्दिर
बदल कर चलने लगाया दिशाएँ
हर जाप किए हिसाब किए
लगा बूझने जो पाप किए
दिन भर की मार झेलकर 
थोड़ी देर जो मूँदी आँख
ज्यों ही खोली तो पाया 
हफ़्ता पूरा सरक गया
इतवार कहीं छलक गया
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Saturday, 22 February 2020

क़मीज़


क़मीज़ अपनी भी साफ़ कर लो

धूल, मैल, छींटें, मिट्टी, हर साबुन का हिसाब कर लो
हर्फ़ यही है कि मौक़ा है, क़मीज़ अपनी भी साफ़ कर लो। 

आस्तीन छिपायी बाहें भी मोड़ीं
टूटी बटनें ज्यों-त्यों ही जोड़ी
जेबों को अब तो अब माफ़ कर दो
हर्फ़ यही है कि मौक़ा है, क़मीज़ अपनी भी साफ़ कर लो। 

ये सिकुड़न बैठी जहान भर की
धब्बों में कहानी साल भर की
रेशों पर ज़रा उपकार कर दो
हर्फ़ यही है कि मौक़ा है, क़मीज़ अपनी भी साफ़ कर लो। 

उड़ा हुआ सा रंग कब से
बेआबरू सी सुगंध कब से
पुरानी तस्वीर से कभी ख़ुद को भी दो-चार कर लो
हर्फ़ यही है कि मौक़ा है, क़मीज़ अपनी भी साफ़ कर लो। 

धूप रही बारिश भी आयी क़ीमत इसने ख़ूब चुकाई
आँगन में गलियारों में यादें इसने भी ख़ूब बनाईं
अपने किए वादों का भी किसी शाम हिसाब कर लो
हर्फ़ यही है कि मौक़ा है, क़मीज़ अपनी भी साफ़ कर लो। 

हो गयी पुरानी देखो कोई नयी कल आएगी
बीतने दो वक़्त, छींट उसपर भी चढ़ जाएगी
तो जब तक है बाहों में हर रेशे-ज़र्रे से इज़हार कर दो
हर्फ़ यही है कि मौक़ा है, क़मीज़ अपनी भी साफ़ कर लो। 


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