Saturday, 22 February 2020

क़मीज़


क़मीज़ अपनी भी साफ़ कर लो

धूल, मैल, छींटें, मिट्टी, हर साबुन का हिसाब कर लो
हर्फ़ यही है कि मौक़ा है, क़मीज़ अपनी भी साफ़ कर लो। 

आस्तीन छिपायी बाहें भी मोड़ीं
टूटी बटनें ज्यों-त्यों ही जोड़ी
जेबों को अब तो अब माफ़ कर दो
हर्फ़ यही है कि मौक़ा है, क़मीज़ अपनी भी साफ़ कर लो। 

ये सिकुड़न बैठी जहान भर की
धब्बों में कहानी साल भर की
रेशों पर ज़रा उपकार कर दो
हर्फ़ यही है कि मौक़ा है, क़मीज़ अपनी भी साफ़ कर लो। 

उड़ा हुआ सा रंग कब से
बेआबरू सी सुगंध कब से
पुरानी तस्वीर से कभी ख़ुद को भी दो-चार कर लो
हर्फ़ यही है कि मौक़ा है, क़मीज़ अपनी भी साफ़ कर लो। 

धूप रही बारिश भी आयी क़ीमत इसने ख़ूब चुकाई
आँगन में गलियारों में यादें इसने भी ख़ूब बनाईं
अपने किए वादों का भी किसी शाम हिसाब कर लो
हर्फ़ यही है कि मौक़ा है, क़मीज़ अपनी भी साफ़ कर लो। 

हो गयी पुरानी देखो कोई नयी कल आएगी
बीतने दो वक़्त, छींट उसपर भी चढ़ जाएगी
तो जब तक है बाहों में हर रेशे-ज़र्रे से इज़हार कर दो
हर्फ़ यही है कि मौक़ा है, क़मीज़ अपनी भी साफ़ कर लो। 


.

No comments:

Post a Comment