Thursday, 24 December 2015

I'll behold


Tried writing something in English. Not so good, I understand, but I still find it beautiful :) 


In the nights of joys and the days of cold
In midst of dark, lone baby oh!
When you kiss your dreams or seek ice-cream
I'll behold. I'll behold.
 
Let the rains fall down let the sun burn red
Let the world shout loud I deserve you less
When you cry for coke or the domino's
I'll behold I'll behold.


I believe in us in bads and goods
I feel your heart, adore your looks
When you hit me hard my baby shrew
I know it's  love, I know it's true.

So let me hold you tight when the cards all fold
Let the moment come let me take you home
Even if you try to run off me bad
I'll behold. I'll behold. 

Sunday, 18 October 2015

7 गिलास चाय



सुबह के घने कोहरे के बाद की तेज़ बारिश में
सर्द के उस महीने में वो सरकारी ऑफिस में
बदन पर उसके एक बेतरतीब सी बनियान थी
पाँव में कुछ चप्पल सा, सर पर काली सी रुमाल थी
सर से पाँव पानी-पानी और काँप रहा था उसका तन
8 साल को वो लड़का फिर बोला - चाय गरम चाय गरम |

चाय गरम की रट लगाये उस लड़के को मैंने पास बुलाया
रोज़ दिखता था गुमटी पर आज जाने उसमे क्या दिख पाया
कि पूछा उससे नाम बताना
कितने की दी दाम बताना |

मासूमियत की जेब से फिर उसने कुछ बोल निकाले
नाम किसी ने दिया नही दाम आप जो मर्ज़ी दे डालें...



रात 10 बजे सीलन लगी उन दीवारों के बीच 
फिर मैंने बोला एक कटिंग लगाना
एक गिलास का 10 मैं दूंगा
आज चाय बस मुझे पिलाना |

और बीस मिनट को हुयी जो बात
चाय के खाली गिलास थे सात
अगले दिन को फिर बुलाया
अजय से फिर हाथ मिलाया...

उस नन्ही सी हथेली का एहसास था इतना नरम
सुबह का अनजान वो लड़का आँखें मेरी कर गया नम
चीख लगाकर मैंने पूछा सपना तेरा क्या है बताना
एक दिन अपनी एक गुमटी होगी अजय प्रेजेंट्स चाय गरम |

Wednesday, 29 July 2015

तुझे खुद से मोहब्बत हो जाए...


तुमको क्या ख़बर कि कितनी मोहब्बत है तुमसे
जो बयाँ कर दूं तो तुझे ख़ुद से मोहब्बत हो जाए...

मन्नतें मेरी क्यों बेआवाज़ रहती हैं
इज़हार जो कर दूं सारी हकीक़त बयाँ हो जाए...

निगाहों का असर है, साँसों की मनमानी है
तुझे देखने को चाँद की सूरज से बग़ावत हो जाए...

क्या खता उनकी जो अब सोते नही हैं रातों में?
तेरे इश्क़ में जागकर रातें नूरानी हो जाएं...

तुमको क्या ख़बर कि कितनी मोहब्बत है तुमसे
जो बयाँ कर दूं तो तुझे ख़ुद से मोहब्बत हो जाए...

Monday, 23 March 2015

सांस तो भर ले ज़रा 2/2

शोहरत के सपनों से दूर सोकर तो देख
काला चश्मा उतार, जी भर रोकर तो देख
गुलाम बन किसी का क्यों मारा - मारा फिरता है
रुक सकते हैं कदम, एक बार रोककर तो देख

पैसे की आड़ में और कितनी खुशियाँ गँवाएगा
भरी जेब कैसे अपने साथ लेकर जाएगा
खाली कर जेबों को हवा के साथ थोड़ा घूम ले
खोल बंद मुठ्ठी को, ज़िन्दगी को ज़रा चूम ले



परिंदे अपनी चाहतों के आज़ाद कर दे तू
जो थामे है तुझे हर बंधन तबाह कर दे तू
खोल अपनी बाहें नए पलों से मिल
नन्ही कली है तू, सावन के फूल सा खिल

जो रिश्ते पीछे छूट गए जा उनको फिर माना ले
जो फ़ीके रह गए पल, जा उनको फिर सजा ले
कितनी हसीं है दुनिया, नज़र तो दौड़ा ज़रा
सामने है मंज़िल, खुलकर सांस तो भर ले ज़रा

हर गम को सीने से आज़ाद कर ज़रा
दो पल तो खुलकर सांस भर ज़रा...

Tuesday, 17 March 2015

सांस तो भर ले ज़रा 1/2

खुले आसमान की एक चिड़िया है ज़िन्दगी
साँसों से मोहब्बत का एक ज़रिया है ज़िन्दगी
हर गम को सीने से आज़ाद कर ज़रा
दो पल तो खुलकर सांस भर ज़रा...

धूप के छींटों से फ़िर नहाकर तो देख
रेत में नंगे पैर फिर भिगोकर तो देख
चांदनी की चादर में तू सोना क्यों भूल गया
दौड़ना सीख गया तू, रुकना क्यों भूल गया?



देख कैसे लहरें सागर में समाती हैं
सुन कैसे वो चिड़िया बेख़ौफ़ गुनगुनाती है
कागजों से निकलकर तू मुस्कुराता क्यों नहीं
जो कह रही है ज़िन्दगी सुन पता क्यों नहीं?

सुन कैसे धडकनें सन्नाटों को चीरती हैं
ख़्वाबों के बुलबुलों से लकीरें कैसे खेलती हैं 
दो पल नज़र झुका खुदा को याद कर ले ज़रा
क़दमों में है मंज़िल, खुलकर साँस तो भर ले ज़रा...

Saturday, 28 February 2015

कैसे?

धूल से सनी किताब काग़ज़ कोरा हो जाए कैसे
गर्त में बसी दुनिया सारी खुद को और गिराएं कैसे
कल चहक रहा था जो आज वो खामोश है
खामोश बेटे को माँ खामोश ही सुलाए कैसे...

दो बातों में जिरह की खान (लड़ने की वजह) तूने ढूंढ निकाली
आधा ही नाम जाना, दिल में पहचान बसा ली
बसी बसाई बस्ती में बसर की सोच बसाएं कैसे
बंजर रगों के खेत में रस चाहत का मिलाएं कैसे...

जिस रस्ते मुड़ रही दुनिया रुख दरिया का घुमाएं कैसे
जो लिखा है आज कागज़ पर बिठाकर कहीं बतलाएं कैसे?


Monday, 9 February 2015

क्या बात है!

चीखों में बदली हैं बातें संगीत बना है शोर
कुछ शांत अगर मिल जाए तो क्या बात है 
जल रही है नदियाँ छूटी आंसुवों की डोर
कोई तालाब भिगा जाए तो क्या बात है

छाँव की रेत बिखरी थी कल तक अब पेड़ों की खबर नहीं
ताज़ी पत्ती कहीं दिख जाए तो क्या बात है
जल उठती हैं सांसें काला हुआ असमान 
पुरानी हवा अगर छू जाए तो क्या बात है



राख बने हैं खेत सभी सुलग रही है बगिया
एक फूल कहीं खिल जाए तो क्या बात है
बिक रही हैं जिन्दगी यहाँ काँप रहे परिंदे
उड़ता भंवरा कभी दिख जाए तो क्या बात है

कट रहें हैं सिर हर घड़ी सस्ती हो गई जानें 
कहीं मुस्कान सच्ची दिख जाए तो क्या बात है
लग रहा है डर हर पहर जिंदा रहना महफूज़ नही
एक कब्र मुझे मिल जाए तो क्या बात है


Friday, 30 January 2015

परिचय...

आओ तुम्हे मैं खुद का परिचय करवाता हूँ
दुबले से शरीर का मन दिखलाता हूँ
प्रेम-पत्र नहीं कविताओं में जल रहा हूँ
गौर फरमाना जरा चिंगारी जलाता हूँ.

कहाँ मेरे बस में है निगलना सरहदों की बातें
दलदल में धंसते सिर और चमचमाती मीनारें
भीग जाती होगी पशु की आँखें जो देखने मात्र से ही
क्यों करता है इन्सान वो मुस्कान दबा के?

नादान हूँ शायद.शायद खून गरम है मेरा
मानता हूँ ये भी अभी दुनिया देखी नहीं
शब्दों की परिभाषा नही जनता शायद
शायद वकालत का हुनर भी सीखा नही.



क्यों उस हमउम्र ने रोटी मांगी तो दस रुपये थमा दिए?
क्यों अबला ने भिक्षा मांगी तो चावल-बताशे लुटा दिए?
क्यों वो छोटा भाई जूते साफ़ कर रहा था?
क्यों बच्चों को सुलाकर किसान पटरी पर सो रहा था?

सड़क के कोने में छिपकर वो भूखा-नंगा हँसता होगा
चंद दिनों का दर्द बचा है, कतरा-कतरा रिसता होगा
हैरान बैठी माँ आँगन में बेटा जो पता भूल गया
मज़ार पर शरीर भी राख की दुआ करता होगा.

कुछ रोक सकता हूँ शायद...शायद कोशिश कर सकता हूँ
स्याही से उलझकर कागज़ पर उतर सकता हूँ
हाँ! यही करूँगा मैं, मैं कविता लिख सकता हूँ
"परिचय" से तुम्हारा खुद से परिचय करा सकता हूँ.
हाँ! मैं कविता लिख सकता हूँ.

Sunday, 18 January 2015

आज क्या लिखूं?

धुंधली सी कई राहें हैं आज किसे चुनुं?
कितनी बातें हैं लिखने को आज क्या लिखूं?

फिर भिगा दूं आँखों को उतार दिल का हाल
या कोशिश करूँ हँसने की, खत्म करूँ ये मलाल
किसी सूरत के नाम कर दूं आज की सारी स्याही
या उतार दूं अपने बचपन को, लिख दूं गुजरे साल?



बता दूं ऐसी बात कोई जो अब तक छिपा रखी थी
ले लूँ उसका नाम जिसकी तस्वीर दबा रखी थी
कुछ क़ुबूल लूँ अपनी गुनाही या एहसान अपने जताऊँ
मुस्कुराऊं आज भी या हर रोज़ सा बहता जाऊं?

लिख दूँ कहानी उस बूँद की जो सागर से ना मिल पायी
 या एहसास उस मासूम की जिसकी सोलह में हुई विदाई?
कितना है ताना-बाना, कौन सा धागा चुनूँ?
कुछ लिखकर मानूँ हार या आज चुप ही बैठा रहूँ?


 धुंधली सी कई राहें हैं आज किसे चुनूँ
कितनी बातें हैं लिखने को आज क्या लिखूं?