पैरों की चादर से बन जाए तो सोएं
पंख आसमान से लड़ जाएं तो सोएं
यूँ तो पैदल चलना ही भाता है मगर
ये दुनिया एक बार दिख जाए तो सोएं।
पोशाकों के हम भी खासा शौकीन नही
बेशौक शौकों की कतारें लग जाएं तो सोएं
दुआओं में मेरा कभी यकीन नही रहा
मकसद ज़रा हाथ लग जाए तो सोएं।
मैंने ख़्वाब देखे हैं आयाम से परे
मैंने वक़्त जिये हैं आराम के परे
मतभेद हुए हैं मेरे खुद के खयालातों से
आहट हुई ओझल मेरी सैर-सपाटों से
जो हासिल हुआ सुकून वो आंखें भर दे है
हर कदम अगले कदम में सांसें भर दे है
अभी लंबा है रास्ता, खत्म होने को आए तो सोएं
अभी भारी है बस्ता, भार ज़रा कट जाए तो सोएं।
कितनी ही सुनी कहानियाँ बचपन में कर्मठता पर, भलाई पर
सरपँच जो जा भिड़ा रोकने दो भाइयों को लड़ाई पर
या लोहार जो हर एक वार में जान छिड़कता था अपनी
वो अम्मा ईंठ उठाए काँधे पर थकान छिपाती थी अपनी
School का मास्टर जिसने किरदार पिता का निभा दिया
डाकिया जो ख़त देते देते जाने कब यारी सिखा गया
दो बैल हीरा मोती क्या सिखा गए इंसानों को
गाओँ की पढ़ी बेटी कैसे जीत गयी संसारों को
अभी बहुत कुछ है कमाने को, ख़ुशी में आँखें भर जाएँ तो सोएँ
यूँ ही पन्नों को पलटते मुझपर लिखी कहानी मिल जाए तो सोएँ।
पैरों की चादर से बन जाए तो सोएं
पंख आसमान से लड़ जाएं तो सोएं।