Saturday, 13 December 2014

बुरखा नहीं डालूंगी मैं...

लड़की (घटना के पास खड़े एक आम आदमी से) :

लफ़्ज़ कहने वाले कह जाते हैं गुज़र जाते हैं कहकर 
लफ़्ज़ सुनने वाली पर जो बीतती  है सुनो 
हैवानियत की मुस्कानें घेरी हैं सुबह से 
डरी सी आँखें क्या ढूँढती हैं सुनो  

आम आदमी (लड़की से) :

रूह जल उठती है आमानवता की सोच से 
मगर साधारण सा इंसान हूँ, क्या करूँ बताओ?
माँ - बहन की काफ़ी हैं बोझ बनने को 
कब सुनूँ तेरी कराहें, ज़रा हमें भी समझाओ 

लड़की (वहाँ खड़े उस आदमी से मदद ना मिलने के बाद एक बुजुर्ग से) :

बेटी सी हूँ आपकी और बहन सी तुम्हारी 
छूकर तन  और नोच आत्मा देखो दरिंदे जा रहे 
कल भी छेड़ा था, कल फिर आएँगे 
मैं डर रही अकेले वो फिर सताएँगे 
रखी बाँधी  थी ना? आवाज़ ओ उठाओ 
आज बाज़ार में छुआ है, कल घर तक आ जाएँगे 

बुजुर्ग (एक हारी हुई नकारात्मक आवाज़ में) :

मिट चुका है देश बेटी पश्चिम के अभिशाप से 
रोज़ की ये बातें हैं अब तो दिन की शुरुआत से 
बात ले मेरी माँ एक बुर्क़ा डाल शरीर पर 
सर झुककर चल ज़रा, हर चोट ले आदाब से 





लड़की (जो भागते हुए अपने घर अपनी माँ के पास जाति है) :

माँ देखो ये खँरोंच इसकी गहराई नहीं नंपती 
मुझे वो दोष देते हैं जिनसे आवाज़ नहीं उठती 
फेर लेते हैं निगाहें फिर तरस को आ जाते हैं 
माँ साथ चलो मेरे मैं चुप बैठ नहीं सकती 

माँ :

बोला था ना निकलो बाहर घर का काम निभाओ 
झुक गया सर गली - गली, शुद्धिकरन कराओ 
किस अभिमान में लोगों से आँख मिलाऊँगा अब?
ढूँढ लिया है तेरा वर, अब दू जे घर को जाओ 

लड़की :

तुम सबकी मानूँ तो हलक को साँस ना पहचाऊँ 
घर से बाहर जाऊँ तो आँख ना उठाऊँ 
ऊपरवला भी हैरान होगा तुम सबकी बातें सुनकर 
जी चाहे क्यूँ ना दुनिया को आग मैं लगाऊँ…

मगर नहीं।
तेज़ाब का अब डर नहीं तुम सबकी बातें सुनकर 
मुझे आग की फ़िकर नहीं इन लफ़्ज़ों में जलकर 
चलूँगी अकेले, लड़ूँगी  अकेले जब तक जिगर में दम  है 
बुर्क़ा नहीं डालूँगी मैं शैतानों से छिपकर 

बुर्क़ा नहीं डालूँगी मैं शैतानों से छिपकर ।

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