जब सूरज की ओज से थका नीला आसमान गाढ़ा हो चला
दसों ऊंघों और थकान से चूर मेरा शरीर बिस्तर का हो चला
एक सिलवट ना आई उस शाम कुछ ऐसा डूबा मैं नींद में
हफ़्तों से नींद का प्यासा मैं ख्वाबों का हो चला |
खटमल सोये हुए थे न मछ्ररों ने परेशान किया
खिड़की ने भी खिटपिट ना की और ना बेचैनी ने हैरान किया
गली के बच्चों का भी इम्तेहान था अगले दिन मानो
छत पर शर्मा जी ने भी कत्थक से आराम लिया |
सोया उस पल मैं मानो समंदर में नींद घुली हो जैसे
या गर्म रेत के मुसाफिर को एक झील दिखी हो जैसे
कुछ ऐसा असर हुआ उस ख्वाब का दिलों-दिमाग पर
बंजर किसी खेत पर काला बादल बरसा हो जैसे |
रह-रहकर मेरी माँ ने मगर मुझे आवाज़ लगाया
बाबा ने भी शोर मचाया दफ्तर में क्या नाम कमाया ?
ख्वाब ज़रा सा हिचकिचाया दरवाज़े पर जो दस्तक हुयी
और बज पड़ा फ़ोन भी जब बहना ने पैगाम उठाया...
गलियारे की बुलबुल बोली अब और न चुप रह पाएगी
चीख लगाकर बाई बोली कल काम पर न आएगी...
आवाजों को सुन मैं बिस्तर के कोने सिमट गया
बोल उठे खटमल भी और चादर सिलवट में ढल गया
यही होता आया है और यही होता आएगा
एक ख्वाब देखा मैंने जो तकिये के नीचे सरक गया...
एक ख्वाब देखा मैंने जो तकिये के नीचे सरक गया...
