Sunday, 21 December 2014

जुबां से फिसलती नहीं...

इश्तेहार-ए-इश्क़ जो गिरा दे वो आवाज़ मुझे मुक़र्रर नहीं
मोहब्बत की तासीर से अनजान तुम्हे आँखों की खबर नहीं
तेरी हथेली को पढ़कर मैंने ये बात जान ली मगर
प्यार मुझी से है तुमको ये बात बस मानती नहीं...

कोई तो मकसद होगा तेरे बाली बगल गिराने का
परियां तो बेवजह यूँ असमान से उतरती नहीं
ये अदाएं ना मार डालें मुझकों कुबूलने से पहले
हलक पे बैठी बात है जुबां से फिसलती नहीं...

तेरी मुस्कुराहट में बंधकर बाघी बना फिरता हूँ मैं
झांक दिल को तेरे मेरा नाम अगर दिख जाए कहीं
ले करता हूँ इज़हार आज जहाँ के कोने-कोने में
अपनाया तूने तो जन्नत है ठुकराया जो तो चोट सही...

इश्तेहार-ए-इश्क़ जो गिरा दे वो आवाज़ मुझे मुक़र्रर नहीं
मोहब्बत की तासीर से अनजान तुम्हे आँखों की खबर नहीं...


Saturday, 13 December 2014

बुरखा नहीं डालूंगी मैं...

लड़की (घटना के पास खड़े एक आम आदमी से) :

लफ़्ज़ कहने वाले कह जाते हैं गुज़र जाते हैं कहकर 
लफ़्ज़ सुनने वाली पर जो बीतती  है सुनो 
हैवानियत की मुस्कानें घेरी हैं सुबह से 
डरी सी आँखें क्या ढूँढती हैं सुनो  

आम आदमी (लड़की से) :

रूह जल उठती है आमानवता की सोच से 
मगर साधारण सा इंसान हूँ, क्या करूँ बताओ?
माँ - बहन की काफ़ी हैं बोझ बनने को 
कब सुनूँ तेरी कराहें, ज़रा हमें भी समझाओ 

लड़की (वहाँ खड़े उस आदमी से मदद ना मिलने के बाद एक बुजुर्ग से) :

बेटी सी हूँ आपकी और बहन सी तुम्हारी 
छूकर तन  और नोच आत्मा देखो दरिंदे जा रहे 
कल भी छेड़ा था, कल फिर आएँगे 
मैं डर रही अकेले वो फिर सताएँगे 
रखी बाँधी  थी ना? आवाज़ ओ उठाओ 
आज बाज़ार में छुआ है, कल घर तक आ जाएँगे 

बुजुर्ग (एक हारी हुई नकारात्मक आवाज़ में) :

मिट चुका है देश बेटी पश्चिम के अभिशाप से 
रोज़ की ये बातें हैं अब तो दिन की शुरुआत से 
बात ले मेरी माँ एक बुर्क़ा डाल शरीर पर 
सर झुककर चल ज़रा, हर चोट ले आदाब से 





लड़की (जो भागते हुए अपने घर अपनी माँ के पास जाति है) :

माँ देखो ये खँरोंच इसकी गहराई नहीं नंपती 
मुझे वो दोष देते हैं जिनसे आवाज़ नहीं उठती 
फेर लेते हैं निगाहें फिर तरस को आ जाते हैं 
माँ साथ चलो मेरे मैं चुप बैठ नहीं सकती 

माँ :

बोला था ना निकलो बाहर घर का काम निभाओ 
झुक गया सर गली - गली, शुद्धिकरन कराओ 
किस अभिमान में लोगों से आँख मिलाऊँगा अब?
ढूँढ लिया है तेरा वर, अब दू जे घर को जाओ 

लड़की :

तुम सबकी मानूँ तो हलक को साँस ना पहचाऊँ 
घर से बाहर जाऊँ तो आँख ना उठाऊँ 
ऊपरवला भी हैरान होगा तुम सबकी बातें सुनकर 
जी चाहे क्यूँ ना दुनिया को आग मैं लगाऊँ…

मगर नहीं।
तेज़ाब का अब डर नहीं तुम सबकी बातें सुनकर 
मुझे आग की फ़िकर नहीं इन लफ़्ज़ों में जलकर 
चलूँगी अकेले, लड़ूँगी  अकेले जब तक जिगर में दम  है 
बुर्क़ा नहीं डालूँगी मैं शैतानों से छिपकर 

बुर्क़ा नहीं डालूँगी मैं शैतानों से छिपकर ।

Monday, 1 December 2014

मुद्दे...


इनका यूँ चलते जाना जिद है या मजबूरी?

उठने को सीने में बैठे मुद्दे आँख मींझते
मुझसे इनका रिश्ता अजनबी सा नही
अक्सर मिलते हैं सिराहने ख़्वाबों को खींचते
कोसती नींद को सुनाते हम भी ज्यादा खुश नहीं...
थक गए हैं शायद इल्ज़ामों के संसार से
पेट काटती गरीबी और दुल्हन के व्यापर से
खून बहाते दुश्मन हैं लालच के आभार से
थक गई है लालच भी लड़ते-मरते संसार से...
लगता है ये मुद्दे सारे बदलने की जिद में बैठे हैं

नींद उड़ाते तेरी-मेरी सुलझने के मत से कहते हैं
हम नहीं ये तुम हो जो बैर फैलाते हो
रंग-नाम-शरीर की कीमत तुम लगाते हो
हमने न डाली आँख-ना हाथ जिसके दामन पर
औरत की बोली बाज़ार में तो तुम लगाते हो...

वो कपट नही सीना था तेरा बारूद से पहले जल गया
सीमा पर लाली का रंग तुम चढाते हो
खुदगर्ज़ी नहीं वो तू था जो खुदा से न डर गया
रस्ते पर माँ-बाप को तो तुम ले आते हो...



हम तो जिंदा होते हैं पल-भर में सो जाने को
हमारी नींद उड़ाकर नफरत में तुम मुस्काते हो
ना कोसो हमें अपने पापों पर मोहरे की फ़िराक में
अपनी दुनिया को तमाशा तो तुम बनाते हो...
वक़्त सामने है अब भी आंख खोलने का
कल की दलीलें बिछाकर क्यों सो जाते हो
हम तो जिंदा होते हैं पल-भर में सो जाने को
हमारी नींद उड़ाकर नफरत में तुम मुस्काते हो...