Thursday, 3 November 2016

शब्द मेरे बहता पानी


झरने के भाँती या सूखे घड़े सा
नीर सा बढ़ता जैसे ढलती जवानी
शब्द मेरे बहता पानी |

गर्त में है बादल में भी
आँखों में बसते जैसे शाम रवानी
काले भी हैं रंगों में भी
मानो कोई प्रेम कहानी
शब्द मेरे बहता पानी |

कानों में घुलता है जैसे
सांझ से मिलती निशा दीवानी
सीने में चुभता है जैसे 
रात में गोद में घाट नूरानी
शब्द मेरे बहता पानी |

Wednesday, 10 August 2016

शिखर


तू शून्य से निहित नहीं, प्रवाह से विलुप्त नही
जो जला भीतर ही है, जल का तू इक्छुक नही
जीत से तू खुश नहीं, तू हारता मनुष्य नही
दीप तू तिमिर नही, तू सांझ का है नभ नही...
कठोर है आसान है विजय की तू पहचान है
जो बोझ काँधे चल रहा हृदय के तेरी जान है
शिखर है तू उफ़ान है, तू शांत है तूफ़ान है
आसमाँ पर है खड़ा तू शक्ति की पहचान है...
तू शूल है त्रिशूल है उसूल है प्रहार है
कायरों की बस्ती में तू शेर की दहाड़ है...
तू थम नही तू रुक नही तू आँधियों को भेद दे
तू जीत ले धरा को तू बेड़ियों को चीर दे
निरर्थ नही ये क्षण तेरा जा इसको तू संवार दे
है शिखर पर तू बसा हर साँस से प्रमाण दे...
है शिखर पर तू बसा हर साँस से प्रमाण दे...
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जो कायर हैं कायरता से उनके बैठे मतभेद हैं
तू शूरवीर: कोख से घाट प्रतिदिन ही कुरुक्षेत्र है
रण में रथ तेरा अब ना कोई चक्रधर रोक सके
ना बाण किसी भी अर्जुन की तेरे कवच को भेद सके
अग्नि की चीख़ उठेगी जब तू राग सति का गाएगा
होलिका की गोदी में नन्हा प्रह्लाद मुस्काएगा
ये रण है जिसमें साँस-साँस में 
जहाँ हर तेरी बात-बात में
हर ऊँगली की आँखें ताके
नाम-नाम में ज़ात-ज़ात में
कर फ़क्र तू अपनी माटी पर बन बीज बंजर उजाड़ दे
है शिखर पर तू बसा हर साँस से प्रमाण दे
है शिखर पर तू बसा हर साँस से प्रमाण दे ।

Sunday, 17 July 2016

उम्मीद मगर ज़रूरी है



उम्मीद मगर ज़रूरी है...
गिरे गर पत्ता, फूंटे छाले या ओझल हो नींद के सीप
काली हो सुबहें, बोझल हों शामें गर कोई नहीं समीप
कितना भी हो सूखा कुवें में गहराई मगर ज़रूरी है...

उम्मीद मगर ज़रूरी है

बाजूं में गर ताक़त ना हो, पैसों की गर आदत ना हो
प्यासी हो कंठों की होली या सूनी आशा की झोली
वक़्त बिखेरे कांटें फिर भी बढ़ना तेरा ज़रूरी है...

उम्मीद मगर ज़रूरी है

चलना गर हो जाए भरी, आँखें लाल कंधे भारी
हार डराए कितना भी जीत तेरी ज़रूरी है...

उम्मीद मगर ज़रूरी है


Friday, 17 June 2016

मैंने कभी खुद को...


मैंने कभी खुद को ना खोला
खिड़की - दरवाज़ों में लग गए दीमक
आँखों का फाटक दिल का ताला ना तोड़ा
मैंने कभी खुद को ना खोला...

आवाक् देखता रहा गुलाब मेरे चेहरे का तेज़ 
जल उठे संगी-साथी देख खुशियों भरा ये भेष
नीम की कोपल मुस्काई देखा था रोते रात को
आया था जब छिपकर मैं रोटी खिलने काग को ...

पूछा किसने-किसने खुशियों का राज़ क्या है ?
किताबों की पढ़ी-पढ़ाई बातें सबको बोला
हँसते - हँसते कितने दफे आए आँखों में आंसू
आदत बुरी बोल गया, सच कभी ना बोला...

मैंने कभी खुद को ना खोला...




Thursday, 9 June 2016

मैं हूँ उसी दुनिया में शायद

कभी चलो ऐसी दुनिया में जहाँ कोई जानता ना हो 
ना सच ना झूठ, अपना-पराया मानता ना हो
ना पर रुकें, ना पैर थकें, ना जीत हो ना हार 
ना बैर हो और दोस्त भी कोई मानता ना हो...

मैं हूँ उसी दुनिया में शायद...

ना शोर ना ख़ामोशी ना तनहाई का डर हो
गम की चादर ताने लड़ता न कोई मन हो
शून्य हो जहाँ आत्मा, ना अँधेरा न उजाला
चलो चलें वहाँ जहाँ से आएं न दोबारा...

मैं हूँ उसी दुनिया में शायद...

Friday, 20 May 2016

अच्छा है...



आंसू बहाना भी अच्छा है
बोझ जताना भी अच्छा है
कल हँसना ही है भीड़ में जाकर
अभी झूठ झुठलाना भी अच्छा है |

खामोश बैठी थीं घुलकर रगों में कराहें 
चीखें बिखरा होठों पर दिल बहलाना भी अच्छा है
तारों की टिमटिम देखी सुन ली कोयल की कूक
पैरों तले माटी को देख अपनी औक़ात जताना भी अच्छा है |

हर सिरा जिस धागे का सुलझने से इनकारे
गांठों पर मोतियों की उम्मीद सजाना भी अच्छा है
जला जिस दिन बिखर जाएंगे ख्वाबों के ये मोती
गम में बैठे आन्सुओं का बिघर जाना भी अच्छा है |

कल हसना ही है भीड़ में जाकर
अभी झूठ झुठलाना भी अच्छा है |

Thursday, 3 March 2016

ज़िल्लत...!


बड़ा लज़ीज़ हुआ करता है उनके हाथ का बना खाना
परोसती है वो ज़िल्लत, मैं चाव से खाता जाता हूँ...

शरबतों सा अंदाज़ है ज़ख्म देने का भी...
शरबतों सा अंदाज़ है ज़ख्म देने का भी
वो घूँट पिलाए जाती है मैं ज़हर चढ़ाये जाता हूँ...

कल का ही होगा किस्सा जब ऊँगली बांधकर चलते थे,
तीर किनारे बीच बजारे बाहों में उसे जकड़ते थे,
शामों को चाय का - सुबहों को आवाज़ का वादा किया था उसने...
वो भी वक़्त था कभी जब वक़्त से न डरा करते थे...

ख्वाब जो बोया था कल का आज इल्म बना वो बैठा है,
याद में उसकी बैठा मैं काँटों को निगला जाता हूँ...
परोसती है वो ज़िल्लत, मैं चाँव से खाता जाता हूँ...

Wednesday, 6 January 2016

तकिये के नीचे सरक गया...

जब सूरज की ओज से थका नीला आसमान गाढ़ा हो चला
दसों ऊंघों और थकान से चूर मेरा शरीर बिस्तर का हो चला 
एक सिलवट ना आई उस शाम कुछ ऐसा डूबा मैं नींद में 
हफ़्तों से नींद का प्यासा मैं ख्वाबों का हो चला |

खटमल सोये हुए थे न मछ्ररों ने परेशान किया 
खिड़की ने भी खिटपिट ना की और ना बेचैनी ने हैरान किया
गली के बच्चों का भी इम्तेहान था अगले दिन मानो 
छत पर शर्मा जी ने भी कत्थक से आराम लिया |

सोया उस पल मैं मानो समंदर में नींद घुली हो जैसे
या गर्म रेत के मुसाफिर को एक झील दिखी हो जैसे
कुछ ऐसा असर हुआ उस ख्वाब का दिलों-दिमाग पर
बंजर किसी खेत पर काला बादल बरसा हो जैसे |



रह-रहकर मेरी माँ ने मगर मुझे आवाज़ लगाया
बाबा ने भी शोर मचाया दफ्तर में क्या नाम कमाया ?
ख्वाब ज़रा सा हिचकिचाया दरवाज़े पर जो दस्तक हुयी
और बज पड़ा फ़ोन भी जब बहना ने पैगाम उठाया...
गलियारे की बुलबुल बोली अब और न चुप रह पाएगी 
चीख लगाकर बाई बोली कल काम पर न आएगी...

आवाजों को सुन मैं बिस्तर के कोने सिमट गया
बोल उठे खटमल भी और चादर सिलवट में ढल गया
यही होता आया है और यही होता आएगा
एक ख्वाब देखा मैंने जो तकिये के नीचे सरक गया...
एक ख्वाब देखा मैंने जो तकिये के नीचे सरक गया...