Thursday, 3 March 2016

ज़िल्लत...!


बड़ा लज़ीज़ हुआ करता है उनके हाथ का बना खाना
परोसती है वो ज़िल्लत, मैं चाव से खाता जाता हूँ...

शरबतों सा अंदाज़ है ज़ख्म देने का भी...
शरबतों सा अंदाज़ है ज़ख्म देने का भी
वो घूँट पिलाए जाती है मैं ज़हर चढ़ाये जाता हूँ...

कल का ही होगा किस्सा जब ऊँगली बांधकर चलते थे,
तीर किनारे बीच बजारे बाहों में उसे जकड़ते थे,
शामों को चाय का - सुबहों को आवाज़ का वादा किया था उसने...
वो भी वक़्त था कभी जब वक़्त से न डरा करते थे...

ख्वाब जो बोया था कल का आज इल्म बना वो बैठा है,
याद में उसकी बैठा मैं काँटों को निगला जाता हूँ...
परोसती है वो ज़िल्लत, मैं चाँव से खाता जाता हूँ...