Friday, 17 June 2016

मैंने कभी खुद को...


मैंने कभी खुद को ना खोला
खिड़की - दरवाज़ों में लग गए दीमक
आँखों का फाटक दिल का ताला ना तोड़ा
मैंने कभी खुद को ना खोला...

आवाक् देखता रहा गुलाब मेरे चेहरे का तेज़ 
जल उठे संगी-साथी देख खुशियों भरा ये भेष
नीम की कोपल मुस्काई देखा था रोते रात को
आया था जब छिपकर मैं रोटी खिलने काग को ...

पूछा किसने-किसने खुशियों का राज़ क्या है ?
किताबों की पढ़ी-पढ़ाई बातें सबको बोला
हँसते - हँसते कितने दफे आए आँखों में आंसू
आदत बुरी बोल गया, सच कभी ना बोला...

मैंने कभी खुद को ना खोला...




Thursday, 9 June 2016

मैं हूँ उसी दुनिया में शायद

कभी चलो ऐसी दुनिया में जहाँ कोई जानता ना हो 
ना सच ना झूठ, अपना-पराया मानता ना हो
ना पर रुकें, ना पैर थकें, ना जीत हो ना हार 
ना बैर हो और दोस्त भी कोई मानता ना हो...

मैं हूँ उसी दुनिया में शायद...

ना शोर ना ख़ामोशी ना तनहाई का डर हो
गम की चादर ताने लड़ता न कोई मन हो
शून्य हो जहाँ आत्मा, ना अँधेरा न उजाला
चलो चलें वहाँ जहाँ से आएं न दोबारा...

मैं हूँ उसी दुनिया में शायद...