कभी चलो ऐसी दुनिया में जहाँ कोई जानता ना हो
ना सच ना झूठ, अपना-पराया मानता ना हो
ना पर रुकें, ना पैर थकें, ना जीत हो ना हार
ना बैर हो और दोस्त भी कोई मानता ना हो...
मैं हूँ उसी दुनिया में शायद...
ना शोर ना ख़ामोशी ना तनहाई का डर हो
गम की चादर ताने लड़ता न कोई मन हो
शून्य हो जहाँ आत्मा, ना अँधेरा न उजाला
चलो चलें वहाँ जहाँ से आएं न दोबारा...
मैं हूँ उसी दुनिया में शायद...
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