Friday, 20 May 2016

अच्छा है...



आंसू बहाना भी अच्छा है
बोझ जताना भी अच्छा है
कल हँसना ही है भीड़ में जाकर
अभी झूठ झुठलाना भी अच्छा है |

खामोश बैठी थीं घुलकर रगों में कराहें 
चीखें बिखरा होठों पर दिल बहलाना भी अच्छा है
तारों की टिमटिम देखी सुन ली कोयल की कूक
पैरों तले माटी को देख अपनी औक़ात जताना भी अच्छा है |

हर सिरा जिस धागे का सुलझने से इनकारे
गांठों पर मोतियों की उम्मीद सजाना भी अच्छा है
जला जिस दिन बिखर जाएंगे ख्वाबों के ये मोती
गम में बैठे आन्सुओं का बिघर जाना भी अच्छा है |

कल हसना ही है भीड़ में जाकर
अभी झूठ झुठलाना भी अच्छा है |

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