Sunday, 17 July 2016

उम्मीद मगर ज़रूरी है



उम्मीद मगर ज़रूरी है...
गिरे गर पत्ता, फूंटे छाले या ओझल हो नींद के सीप
काली हो सुबहें, बोझल हों शामें गर कोई नहीं समीप
कितना भी हो सूखा कुवें में गहराई मगर ज़रूरी है...

उम्मीद मगर ज़रूरी है

बाजूं में गर ताक़त ना हो, पैसों की गर आदत ना हो
प्यासी हो कंठों की होली या सूनी आशा की झोली
वक़्त बिखेरे कांटें फिर भी बढ़ना तेरा ज़रूरी है...

उम्मीद मगर ज़रूरी है

चलना गर हो जाए भरी, आँखें लाल कंधे भारी
हार डराए कितना भी जीत तेरी ज़रूरी है...

उम्मीद मगर ज़रूरी है