पता नहीं क्या पता नहीं
फिर आँसू क्यूँ पता नहीं
वो है बची ज़रा सी या है बची ज़रा भी नहीं
है पता क्या वो पता नहीं फिर मन क्यूँ बैठा जाता है
शांत सब उफानों में
क्यूँ ख़ामोश है दरिया पता नहीं
आँखों के समंदर को उसके
याद किए दिन ढल जाता है
दस्तक देती रात कब
कब ढल जाता है दिन पता नहीं...
पता नहीं क्या पता नहीं
फिर आँसू क्यूँ पता नहीं...
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“एहसास” गिरेबाँ है
आइने सभी बे-ईमान हैं
क़ुदरत ने मिलाया तुझसे
आगे उसका इंतज़ाम है
यहीसोचकर तकल्लुफ़ मे ये हर पल मे सौ पल झल्लाता है
हाथ मगर उठता नहीं तुम्हें रोकने को क्यूँ पता नहीं
तुझे छुए जनम बिता दिया
बिना छुए क्यूँ बिताऊँ पता नहीं ...
पता नहीं क्या पता नहीं
फिर आँसू क्यूँ पता नहीं...
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आलिंगन के पत्ते-पत्ते बिन सूखे झड़ने को हैं
पूरे होने के रास्ते पर जो ख़्वाब हैं मुड़ने को हैं
है क्या पूरा अधूरा क्या है ये मायाजाल किस काम का
होने को क्या है आगे? बस इंतेज़ार कमाल का
मन मे था आज जो कुछ भी जाने था कब से पता नहीं...
पता नहीं क्या पता नहीं
फिर आँसू क्यूँ पता नहीं...
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