Monday, 23 March 2015

सांस तो भर ले ज़रा 2/2

शोहरत के सपनों से दूर सोकर तो देख
काला चश्मा उतार, जी भर रोकर तो देख
गुलाम बन किसी का क्यों मारा - मारा फिरता है
रुक सकते हैं कदम, एक बार रोककर तो देख

पैसे की आड़ में और कितनी खुशियाँ गँवाएगा
भरी जेब कैसे अपने साथ लेकर जाएगा
खाली कर जेबों को हवा के साथ थोड़ा घूम ले
खोल बंद मुठ्ठी को, ज़िन्दगी को ज़रा चूम ले



परिंदे अपनी चाहतों के आज़ाद कर दे तू
जो थामे है तुझे हर बंधन तबाह कर दे तू
खोल अपनी बाहें नए पलों से मिल
नन्ही कली है तू, सावन के फूल सा खिल

जो रिश्ते पीछे छूट गए जा उनको फिर माना ले
जो फ़ीके रह गए पल, जा उनको फिर सजा ले
कितनी हसीं है दुनिया, नज़र तो दौड़ा ज़रा
सामने है मंज़िल, खुलकर सांस तो भर ले ज़रा

हर गम को सीने से आज़ाद कर ज़रा
दो पल तो खुलकर सांस भर ज़रा...

Tuesday, 17 March 2015

सांस तो भर ले ज़रा 1/2

खुले आसमान की एक चिड़िया है ज़िन्दगी
साँसों से मोहब्बत का एक ज़रिया है ज़िन्दगी
हर गम को सीने से आज़ाद कर ज़रा
दो पल तो खुलकर सांस भर ज़रा...

धूप के छींटों से फ़िर नहाकर तो देख
रेत में नंगे पैर फिर भिगोकर तो देख
चांदनी की चादर में तू सोना क्यों भूल गया
दौड़ना सीख गया तू, रुकना क्यों भूल गया?



देख कैसे लहरें सागर में समाती हैं
सुन कैसे वो चिड़िया बेख़ौफ़ गुनगुनाती है
कागजों से निकलकर तू मुस्कुराता क्यों नहीं
जो कह रही है ज़िन्दगी सुन पता क्यों नहीं?

सुन कैसे धडकनें सन्नाटों को चीरती हैं
ख़्वाबों के बुलबुलों से लकीरें कैसे खेलती हैं 
दो पल नज़र झुका खुदा को याद कर ले ज़रा
क़दमों में है मंज़िल, खुलकर साँस तो भर ले ज़रा...