खुले आसमान की एक चिड़िया है ज़िन्दगी
साँसों से मोहब्बत का एक ज़रिया है ज़िन्दगी
हर गम को सीने से आज़ाद कर ज़रा
दो पल तो खुलकर सांस भर ज़रा...
धूप के छींटों से फ़िर नहाकर तो देख
रेत में नंगे पैर फिर भिगोकर तो देख
चांदनी की चादर में तू सोना क्यों भूल गया
दौड़ना सीख गया तू, रुकना क्यों भूल गया?
देख कैसे लहरें सागर में समाती हैं
सुन कैसे वो चिड़िया बेख़ौफ़ गुनगुनाती है
कागजों से निकलकर तू मुस्कुराता क्यों नहीं
जो कह रही है ज़िन्दगी सुन पता क्यों नहीं?
सुन कैसे धडकनें सन्नाटों को चीरती हैं
ख़्वाबों के बुलबुलों से लकीरें कैसे खेलती हैं
दो पल नज़र झुका खुदा को याद कर ले ज़रा
क़दमों में है मंज़िल, खुलकर साँस तो भर ले ज़रा...

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