Sunday, 11 October 2020

इतवार


इतवार कहीं छलक गया
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हफ़्तों में संजोया था
घण्टों में पिरोया था
फ़र्शें चमकायीं, धूल उड़ायीं
कैलेंडर को दीप-बत्ती दिखलायी
बिस्तर टटोला चादर सँवारे
परदों से ढाँके सारे उजाले
शनिवार नहाया पान लगाया
मदिरा संग जलपान सजाया
मिनट भर बीड़ी क्या सुलगायी
जाम मेरा भड़क गया
इतवार कहीं छलक गया
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मुर्दों ने बोला यहाँ चैन नहीं है
नर्क नहीं कोई स्वर्ग नहीं है
जितनी कहानियाँ उतने सार
हर सवाल का हल इतवार
मैंने ताने मूँछ चढ़ा तेवर 
कि क्या रखा बाक़ी दिन में ?
झक मारें सब नाकारे सब
क्या क़ीमत इनकी महफ़िल में
ये बात सुनी तो सच मानो
मंगल मेरा भड़क गया
ना शुक्र दो पल बैठा शान्त
गुरु भी झट से तमक गया
इतवार कहीं छलक गया
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घनघोर प्रकोप: मंगल me  दोष
शनि प्रसन्न, सोम में रोष
टीके, मंतर, पत्थर, पताके
घर आँगन छाती से चिपकाए
बदले नाम बदले मन्दिर
बदल कर चलने लगाया दिशाएँ
हर जाप किए हिसाब किए
लगा बूझने जो पाप किए
दिन भर की मार झेलकर 
थोड़ी देर जो मूँदी आँख
ज्यों ही खोली तो पाया 
हफ़्ता पूरा सरक गया
इतवार कहीं छलक गया
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