Monday, 10 September 2018

कुछ बन गया जब...

कुछ बन गया जब तब लिखूंगा

सिलने को सुराख कई हैं
दीवारों में रिसाव है बहुत
पहर-पहर है धूप-घूप
उगाने को छाँव है बहुत
वज़न बढ़ेगा शब्दों में जब, दो बात तब कहूंगा
कुछ बन गया जब तब लिखूंगा।

मेज़ पर राखी डायरी पर धूल जमी है जमने दो
स्याही-कागज़ के बंधन में फूंट लगी है लगने दो
पग-पग करके दर-दर चल के राह हज़ारों काटी हैं
छिलते हैं गर पाँव सफर में थोड़ा तो उनको सहने दो
जब चेत जगेगा प्राणी-प्राणी हुँकार तब भरूँगा
कुछ बन गया जब तब लिखूंगा।

धरा के ऊपर आग बरस रही
धारा के नीचे त्राहि
भविष्य में डर का कोलाहल है
बीते कल में तबाही
काँटे खिलते डाली-डाली
सर पर हाथ रखे माली
पुष्प ढूंढती आंखें उसकी
बीजों का हाल सवाली
दो गज़ कमल जब ऊगा दूँ मैं इत्मिनान तब भरूँगा
कुछ बन गया जब तब लिखूंगा।
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