Friday, 30 January 2015

परिचय...

आओ तुम्हे मैं खुद का परिचय करवाता हूँ
दुबले से शरीर का मन दिखलाता हूँ
प्रेम-पत्र नहीं कविताओं में जल रहा हूँ
गौर फरमाना जरा चिंगारी जलाता हूँ.

कहाँ मेरे बस में है निगलना सरहदों की बातें
दलदल में धंसते सिर और चमचमाती मीनारें
भीग जाती होगी पशु की आँखें जो देखने मात्र से ही
क्यों करता है इन्सान वो मुस्कान दबा के?

नादान हूँ शायद.शायद खून गरम है मेरा
मानता हूँ ये भी अभी दुनिया देखी नहीं
शब्दों की परिभाषा नही जनता शायद
शायद वकालत का हुनर भी सीखा नही.



क्यों उस हमउम्र ने रोटी मांगी तो दस रुपये थमा दिए?
क्यों अबला ने भिक्षा मांगी तो चावल-बताशे लुटा दिए?
क्यों वो छोटा भाई जूते साफ़ कर रहा था?
क्यों बच्चों को सुलाकर किसान पटरी पर सो रहा था?

सड़क के कोने में छिपकर वो भूखा-नंगा हँसता होगा
चंद दिनों का दर्द बचा है, कतरा-कतरा रिसता होगा
हैरान बैठी माँ आँगन में बेटा जो पता भूल गया
मज़ार पर शरीर भी राख की दुआ करता होगा.

कुछ रोक सकता हूँ शायद...शायद कोशिश कर सकता हूँ
स्याही से उलझकर कागज़ पर उतर सकता हूँ
हाँ! यही करूँगा मैं, मैं कविता लिख सकता हूँ
"परिचय" से तुम्हारा खुद से परिचय करा सकता हूँ.
हाँ! मैं कविता लिख सकता हूँ.

Sunday, 18 January 2015

आज क्या लिखूं?

धुंधली सी कई राहें हैं आज किसे चुनुं?
कितनी बातें हैं लिखने को आज क्या लिखूं?

फिर भिगा दूं आँखों को उतार दिल का हाल
या कोशिश करूँ हँसने की, खत्म करूँ ये मलाल
किसी सूरत के नाम कर दूं आज की सारी स्याही
या उतार दूं अपने बचपन को, लिख दूं गुजरे साल?



बता दूं ऐसी बात कोई जो अब तक छिपा रखी थी
ले लूँ उसका नाम जिसकी तस्वीर दबा रखी थी
कुछ क़ुबूल लूँ अपनी गुनाही या एहसान अपने जताऊँ
मुस्कुराऊं आज भी या हर रोज़ सा बहता जाऊं?

लिख दूँ कहानी उस बूँद की जो सागर से ना मिल पायी
 या एहसास उस मासूम की जिसकी सोलह में हुई विदाई?
कितना है ताना-बाना, कौन सा धागा चुनूँ?
कुछ लिखकर मानूँ हार या आज चुप ही बैठा रहूँ?


 धुंधली सी कई राहें हैं आज किसे चुनूँ
कितनी बातें हैं लिखने को आज क्या लिखूं?