आओ तुम्हे मैं खुद का परिचय करवाता हूँ
दुबले से शरीर का मन दिखलाता हूँ
प्रेम-पत्र नहीं कविताओं में जल रहा हूँ
गौर फरमाना जरा चिंगारी जलाता हूँ.
कहाँ मेरे बस में है निगलना सरहदों की बातें
दलदल में धंसते सिर और चमचमाती मीनारें
भीग जाती होगी पशु की आँखें जो देखने मात्र से ही
क्यों करता है इन्सान वो मुस्कान दबा के?
नादान हूँ शायद.शायद खून गरम है मेरा
मानता हूँ ये भी अभी दुनिया देखी नहीं
शब्दों की परिभाषा नही जनता शायद
शायद वकालत का हुनर भी सीखा नही.
क्यों उस हमउम्र ने रोटी मांगी तो दस रुपये थमा दिए?
क्यों अबला ने भिक्षा मांगी तो चावल-बताशे लुटा दिए?
क्यों वो छोटा भाई जूते साफ़ कर रहा था?
क्यों बच्चों को सुलाकर किसान पटरी पर सो रहा था?
सड़क के कोने में छिपकर वो भूखा-नंगा हँसता होगा
चंद दिनों का दर्द बचा है, कतरा-कतरा रिसता होगा
हैरान बैठी माँ आँगन में बेटा जो पता भूल गया
मज़ार पर शरीर भी राख की दुआ करता होगा.
कुछ रोक सकता हूँ शायद...शायद कोशिश कर सकता हूँ
स्याही से उलझकर कागज़ पर उतर सकता हूँ
हाँ! यही करूँगा मैं, मैं कविता लिख सकता हूँ
"परिचय" से तुम्हारा खुद से परिचय करा सकता हूँ.
हाँ! मैं कविता लिख सकता हूँ.

