धुंधली सी कई राहें हैं आज किसे चुनुं?
कितनी बातें हैं लिखने को आज क्या लिखूं?
फिर भिगा दूं आँखों को उतार दिल का हाल
या कोशिश करूँ हँसने की, खत्म करूँ ये मलाल
किसी सूरत के नाम कर दूं आज की सारी स्याही
या उतार दूं अपने बचपन को, लिख दूं गुजरे साल?
बता दूं ऐसी बात कोई जो अब तक छिपा रखी थी
ले लूँ उसका नाम जिसकी तस्वीर दबा रखी थी
कुछ क़ुबूल लूँ अपनी गुनाही या एहसान अपने जताऊँ
मुस्कुराऊं आज भी या हर रोज़ सा बहता जाऊं?
लिख दूँ कहानी उस बूँद की जो सागर से ना मिल पायी
या एहसास उस मासूम की जिसकी सोलह में हुई विदाई?
कितना है ताना-बाना, कौन सा धागा चुनूँ?
कुछ लिखकर मानूँ हार या आज चुप ही बैठा रहूँ?
धुंधली सी कई राहें हैं आज किसे चुनूँ
कितनी बातें हैं लिखने को आज क्या लिखूं?

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