Saturday, 28 February 2015

कैसे?

धूल से सनी किताब काग़ज़ कोरा हो जाए कैसे
गर्त में बसी दुनिया सारी खुद को और गिराएं कैसे
कल चहक रहा था जो आज वो खामोश है
खामोश बेटे को माँ खामोश ही सुलाए कैसे...

दो बातों में जिरह की खान (लड़ने की वजह) तूने ढूंढ निकाली
आधा ही नाम जाना, दिल में पहचान बसा ली
बसी बसाई बस्ती में बसर की सोच बसाएं कैसे
बंजर रगों के खेत में रस चाहत का मिलाएं कैसे...

जिस रस्ते मुड़ रही दुनिया रुख दरिया का घुमाएं कैसे
जो लिखा है आज कागज़ पर बिठाकर कहीं बतलाएं कैसे?


Monday, 9 February 2015

क्या बात है!

चीखों में बदली हैं बातें संगीत बना है शोर
कुछ शांत अगर मिल जाए तो क्या बात है 
जल रही है नदियाँ छूटी आंसुवों की डोर
कोई तालाब भिगा जाए तो क्या बात है

छाँव की रेत बिखरी थी कल तक अब पेड़ों की खबर नहीं
ताज़ी पत्ती कहीं दिख जाए तो क्या बात है
जल उठती हैं सांसें काला हुआ असमान 
पुरानी हवा अगर छू जाए तो क्या बात है



राख बने हैं खेत सभी सुलग रही है बगिया
एक फूल कहीं खिल जाए तो क्या बात है
बिक रही हैं जिन्दगी यहाँ काँप रहे परिंदे
उड़ता भंवरा कभी दिख जाए तो क्या बात है

कट रहें हैं सिर हर घड़ी सस्ती हो गई जानें 
कहीं मुस्कान सच्ची दिख जाए तो क्या बात है
लग रहा है डर हर पहर जिंदा रहना महफूज़ नही
एक कब्र मुझे मिल जाए तो क्या बात है