Friday, 2 November 2018

पीने का मन हो चला है।


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निशब्द हूँ निरन्तर
हैं बोझिल नैन, भार मस्तक पर
धुआँ सा स्वभाव मेरा
काली स्याही सफ़ेद कागज़ पर
बिखर पन्नों पर मूंदें आँख
मन हल्का होने चला है
पीने का मन हो चला है।
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पिया पानी, शरबत, मधु
सूखा कोने-कोने
दो बूँद लगा अमृत की होठों
मन छूटा रोने-रोने
मन की गाँठें सब खुल गयीं
मेरी रूह धूमिल धुल गयी
तू विष बोले या पाप इसे
लब अर्पित हो चला है
पीने का मन हो चला है।

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ना रखा कुछ खुद में है
ना तेरी है तेरी ख्वाइश
बेकार बसंत की मांग करे तू
तृप्त तो करती बारिश
पानी की बूंदों में स्वाद कहाँ
रस बैठा अमृत के मयखानों में
बिन बेड़ी कौन आज़ाद यहाँ
हवा तो विष के गलियारों में
मैं बन पतंग उड़ जाऊं गलियों में
कण-कण कह चला है
पीने का मन हो चला है।
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वो बनाते हैं क़िस्से शामों में
गुमटी पर, दुकानों में
मैं तलाश में हूँ एक सार की
वो मिलते शराबखानों में
जो देखा है जो सीखा है
उम्र से उसका क्या ताल्लुक़
ये बंधन इस शरीर से 
काफ़ी ऊपर हो चला है 
पीने का मन हो चला है।