इश्तेहार-ए-इश्क़
जो गिरा दे वो आवाज़ मुझे मुक़र्रर नहीं
मोहब्बत की तासीर
से अनजान तुम्हे आँखों की खबर नहीं
तेरी हथेली को
पढ़कर मैंने ये बात जान ली मगर
प्यार मुझी से है
तुमको ये बात बस मानती नहीं...
कोई तो मकसद होगा तेरे
बाली बगल गिराने का
परियां तो बेवजह
यूँ असमान से उतरती नहीं
ये अदाएं ना मार
डालें मुझकों कुबूलने से पहले
हलक पे बैठी बात
है जुबां से फिसलती नहीं...
तेरी मुस्कुराहट
में बंधकर बाघी बना फिरता हूँ मैं
झांक दिल को तेरे
मेरा नाम अगर दिख जाए कहीं
ले करता हूँ
इज़हार आज जहाँ के कोने-कोने में
अपनाया तूने तो
जन्नत है ठुकराया जो तो चोट सही...
इश्तेहार-ए-इश्क़
जो गिरा दे वो आवाज़ मुझे मुक़र्रर नहीं
मोहब्बत की तासीर
से अनजान तुम्हे आँखों की खबर नहीं...

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