Monday, 1 December 2014

मुद्दे...


इनका यूँ चलते जाना जिद है या मजबूरी?

उठने को सीने में बैठे मुद्दे आँख मींझते
मुझसे इनका रिश्ता अजनबी सा नही
अक्सर मिलते हैं सिराहने ख़्वाबों को खींचते
कोसती नींद को सुनाते हम भी ज्यादा खुश नहीं...
थक गए हैं शायद इल्ज़ामों के संसार से
पेट काटती गरीबी और दुल्हन के व्यापर से
खून बहाते दुश्मन हैं लालच के आभार से
थक गई है लालच भी लड़ते-मरते संसार से...
लगता है ये मुद्दे सारे बदलने की जिद में बैठे हैं

नींद उड़ाते तेरी-मेरी सुलझने के मत से कहते हैं
हम नहीं ये तुम हो जो बैर फैलाते हो
रंग-नाम-शरीर की कीमत तुम लगाते हो
हमने न डाली आँख-ना हाथ जिसके दामन पर
औरत की बोली बाज़ार में तो तुम लगाते हो...

वो कपट नही सीना था तेरा बारूद से पहले जल गया
सीमा पर लाली का रंग तुम चढाते हो
खुदगर्ज़ी नहीं वो तू था जो खुदा से न डर गया
रस्ते पर माँ-बाप को तो तुम ले आते हो...



हम तो जिंदा होते हैं पल-भर में सो जाने को
हमारी नींद उड़ाकर नफरत में तुम मुस्काते हो
ना कोसो हमें अपने पापों पर मोहरे की फ़िराक में
अपनी दुनिया को तमाशा तो तुम बनाते हो...
वक़्त सामने है अब भी आंख खोलने का
कल की दलीलें बिछाकर क्यों सो जाते हो
हम तो जिंदा होते हैं पल-भर में सो जाने को
हमारी नींद उड़ाकर नफरत में तुम मुस्काते हो...


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