सोचता हूँ मैं,अगर अँधा होता तो क्या होता?
कोई दीवार ना होती,कहीं दरार ना होती
बेवजह ख़लिश से कहीं टकरार ना होती
कितनी छत है सिर के ऊपर,सच जानकार ये आँख ना रोती
एक रंग की होती शकलें,सूरत शिक़नो की मोहताज़ ना होती...
व्यंग की मुस्कान बस बातों में होती
ग़रीबी की थकान बस किताबों में होती
हरे रंग में मिल जाती है जो खुशबू नज़र वालों को
मेरी शौक़त और शान बस मोहब्बत मे होती...
अगर मैं अँधा होता तो क्या होता?
हर रस्ता मेरा होता,हर मंज़िल मेरी होती
दिन काले होते तो क्या रात का डर ना होता
हर पल मेरे लिए एक नया सवेरा होता...
अगर मैं अँधा होता तो क्या होता?
#MyInkMyPrints
#Poem
#apourv_pandey

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