Friday, 15 August 2014

असल आज़ादी...

 This is an attempt to express the feelings of mother India when there were celebrations going on 67 years before.



मेरे टुकड़ों को जाने कब मेरे टुकड़े करना आ गया
जिसकी कोख में जिए जनम उसकी जान से खेलना आ गया
कल तक जिस माँ को आवाज़ दिए थकते नही थे बच्चे
आज उन्हें ना जाने कैसे उसका खून बहाना आ गया...

चीर मुझे टुकड़ों में दुश्मनी की साँसें जीते हो
रिश्ते तोड़े जिस दिन उसे आज़ादी का नाम देते हो
क्या पाया तुमने अपने अपनों को बैरी बनाकर?
क्यूँ मेरे बच्चों ये झूठी आज़ादी सहते हो?

मैं चीख रही थी आहों में,कोई सुनने नही आया
चीर दिया मुझे टुकड़ों मे कोई मरहम नहीं आया
क्यूँ इतने ख़ुदग़र्ज़ हो गये तुम की ये भी एहसास ना रहा
मैं रोती रही दिनों-रात कोई आँसू पोछ्ने ना आया...

छूटी खुशी को फिर अपना लो,वक़्त अभी बाकी है
नफ़रत की राख से इश्क़ सज़ा लो मोहब्बत बहुत बाकी है
कब तक यूँ मेरे तन को लकीरों से सजाते रहोगे
हाथ बढ़ाने भर की है देरी,असल आज़ादी अभी बाकी है...

मेरे कलेजो को जाने कब मौत का दामन भा गया
काली खिलने को बेताब थी जो उसे काँटों में घुलना आ गया
एकबार तो कोई बेटा मेरे तन को सहला जाता
जिनके सर पर फेरे थे हाथ मैने,उन्हे मेरा सर काटना आ गया...

मेरे टुकड़ों को जाने कब मेरे टुकड़े करना आ गया
जिसकी कोख में जिए जनम उसकी जान से खेलना आ गया...

#MyInkMyPrints
#Poem
#apourv_pandey

No comments:

Post a Comment