सुबह के घने कोहरे के बाद की तेज़ बारिश में
सर्द के उस महीने में वो सरकारी ऑफिस में
बदन पर उसके एक बेतरतीब सी बनियान थी
पाँव में कुछ चप्पल सा, सर पर काली सी रुमाल थी
सर से पाँव पानी-पानी और काँप रहा था उसका तन
8 साल को वो लड़का फिर बोला - चाय गरम चाय गरम |
चाय गरम की रट लगाये उस लड़के को मैंने पास बुलाया
रोज़ दिखता था गुमटी पर आज जाने उसमे क्या दिख पाया
कि पूछा उससे नाम बताना
कितने की दी दाम बताना |
मासूमियत की जेब से फिर उसने कुछ बोल निकाले
नाम किसी ने दिया नही दाम आप जो मर्ज़ी दे डालें...
रात 10 बजे सीलन लगी उन दीवारों के बीच
फिर मैंने बोला एक कटिंग लगाना
एक गिलास का 10 मैं दूंगा
आज चाय बस मुझे पिलाना |
और बीस मिनट को हुयी जो बात
चाय के खाली गिलास थे सात
अगले दिन को फिर बुलाया
अजय से फिर हाथ मिलाया...
उस नन्ही सी हथेली का एहसास था इतना नरम
सुबह का अनजान वो लड़का आँखें मेरी कर गया नम
चीख लगाकर मैंने पूछा सपना तेरा क्या है बताना
एक दिन अपनी एक गुमटी होगी अजय प्रेजेंट्स चाय गरम |

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