Wednesday, 9 July 2014

याद है...



रेत पर नंगे पैर चलते हाथों का छू जाना याद है
चाय की चुस्की लेते वक़्त नज़रों का मिल जाना याद है
याद है वो भीड़ में छिपकर एक-दूसरे को देखना
जानकार वो अनजाने में अपना करीब आना याद है...

दबे-दबे होठों पर तब कुछ लफ्ज़ हुआ करते थे
सोयी हुई नींदों में कुछ ख्वाब जगा करते थे
क्या दौर था वो जब आँखें बोला करती थीं
हम भी मुस्कुराकर दिल का हाल बयां करते थे...

वो तेरा तीखा काजल आँखों के कोनों में सजना याद है
तेरी पसंद का वो कंगन कलाई में घुमाना याद है
वो लटें तेरी जो रह-रहकर तुझे छेड़ा करती थीं
और उन्हें संवारते वक़्त वो तेरा इतराना याद है...



उफान पर थी धडकनें,करवटों की मनमानी थी
सिराहने सोये थे गम सभी,सिलवटों की शैतानी थी
कितने ही ख्वाब पल-पल बेचैन किया करते थे
प्यार की सीढ़ी चढ़ते वक़्त वो साँसें भी तूफानी थीं...

तेरा उड़ता दुपट्टा थामकर वो तुझे लौटना याद है
भीगी जुल्फें लहराकर वो तेरा शर्माना याद है
याद है वो चौराहा जहाँ इज़हार तुझसे किया था
और इशारों में तेरा वो हामी भरना याद है...

                                               रेत पर नंगे पैर चलते हाथों का छू जाना याद है...
#MyInkMyPrints
#Poem
#apourv_pandey

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