आज के दौर मे हम सभी को एक काम बहुत अच्छे से आता है...वो है "कोसना".
ऊपर वाले से लेकर वक़्त, नसीब और फिलहाल हर कोई गर्मी और बिजली को कोस रहा है...
जिस तरह से हम जीते आ रहे हैं, वो दिन भी दूर नही जब दिन का निकला सूरज रात मे डूबेगा नही...
कैसा होगा वो दौर,एक नज़र दीजिएगा...
खबर आई थी दूर कहीं , ज़िंदा है कोई जान कहीं
सर पर था सूरज अब भी , रात मे तितली निकल पड़ी
सूखी नसें भिगोने को दुआ उसने अता की
अरसे की चाहत अपनी पाने को वो मचल पड़ी .
थककर रास्ते मे दो पल पैरों को ज़मीन पर लाया
उगल रही थी आग ज़मीन फिर उसने पर फैलाया
ठहरना चाहा जहाँ भी उसने,पर जलने को आए
हार रही थी हिम्मत वो ढूँढे छाव नही वो पाए .
उबल रही थी हवाएँ भी,सांसो ने फिर हरा दिया
आँसू भी मुनसिफ़ ना थे,झोंको ने पर भी जला दिया
चलता रहा इंसान मगर यूँही अपनी राहों पर
जिसे देख ना पाया वो,उस मौत ने खुदा को डरा दिया .
ना बची अब उसकी धरती,इंसान ने खुदा को हरा दिया...इंसान ने खुदा को हरा दिया .
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