Thursday, 6 July 2017

मशहूर


जाम शराब का होठों पर लगा नही अभी
कमबख्त बेवजह ही ज़हर का शहूर मानते हैं...
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मख़मली लिबास, वो कजरना निगाहें
वो हँसकर 'ना' कहने की उलझाने वाली फ़ितरत
तेरी दगा को भी हम इश्क़ से बदस्तूर मानते हैं...
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इतने भी कद्रदान न तेरे कि जीना जैसे भूल गए हों
बस इतनी सी है तलब तुझे बेशुमार चाहते हैं...
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गजरे जीवन से टूट गए, कानों से पायल रूठ गए
जो बची है मेरे कानो में तेरी आवाज़ को संगीत मानते हैं...
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उस मोड़ का क्या पता जहां मिलें हम और साँसें भी हों
जहां सांझ एक हो दोनो की और एक ही सुबहें भी हों
रगों में उस वक़्त का नशा हर पहर खींच ले जाते हैं
इसी क़वायद से तो मोहल्ले में 'मशहूर' जानते हैं...
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तेरी दगा को भी इश्क़ सा हम बदस्तूर मानते हैं ।

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