Thursday, 11 May 2017

शोहरत !


शोहरत तेरे नखरे बड़े हैं इज्ज़तदारों के दरबार में
कभी कलाई थाम तुझे तेरे बाज़ार से उठा लाऊंगा |

बरसों बरस में जाना तू बिकती है बोलियों में
मैं तेरी बोली इज्ज़त की किश्तों में लगाऊंगा |

सोचा तो था जो तू आएगी, तर जायेगी रूह तक
अब नस नस को मेरी मैं घूँट तेरे पिलाऊंगा |

जयादा ताकुल्लुफ़ न हुयी मुझे वक़्त की आड़ में छिपने में
चाँद बादलों को रोशन करता है मैं वक़्त को कर जाऊंगा |

ना हुआ समंदर तो क्या हुआ इस पोखर में वो हिम्मत है
रुके सागर को मैं ज़मीन चीरते मिल आऊंगा |

ऐ शोहरत तू इल्म न कर यूँ अपनी खूबसूरती पर
तू इश्क नही कोई कि मैं हँसकर फ़ना हो जाऊंगा |

मिलना मुझसे बुलंदियों पर तू आज नहीं तो कल सही
तेरा मुझे मालूम नही मैं तो शिखर तक जाऊँगा |

कभी कलाई थाम तुझे तेरे बाज़ार से उठा लाऊंगा |


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